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बीएआरसी कर्मचारी को पैनल घर बताने के लिए साधा गया: सीईओ पार्थो दासगुप्ता

नई दिल्ली: एक चौंकाने वाले खुलासे में ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बीएआरसी) इंडिया के सीईओ पार्थो दासगुप्ता ने कहा है कि बीएआरसी के मीटर जब लगाए जा रहे थे, तब परिषद के एक कर्मचारी को पैनल में शामिल घरों का पता बताने के लिए लालच दिया गया था। हालांकि, दासगुप्ता ने यह नहीं बताया कि किस जगह ये घटना हुई थी और कौन लोग इसके पीछे थे।

दासगुप्ता ने दिल्ली में टेलिविज़न पोस्ट के डिजिटाइज़ इंडिया सम्मेलन के एक सेमिनार में प्रमुख संबोधन करने के बाद डिश टीवी के प्रबंध निदेशक जवाहर गोयल के सवाल का जवाब देते हुए यह बात कही।

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उनका कहना था, “पिछले सात महीनों में कुछ शहरों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं। जैसे, दस घरों का पता बताने के लिए हमारे एक कर्मचारी को एक लाख रुपए नकद दिए गए और 4 लाख रुपए बाद में दिए जाने थे।”

दासगुप्ता ने बताया कि बीएआरसी ऐसे मामलों से निपटने के लिए अपने पैनल के 25 प्रतिशत घर हर साल बदल देता है। इस समय बीएआरसी 22,000 घरों को ट्रैक करता है और उसने इन घरों में 25,000 मीटर लगा रखे हैं।

उन्होंने एक और उदाहरण दिया है, जब टीवी चैनलों के अधिकारियों ने अपने शोज़ देखने के लिए बीएआरसी पैनल के घरों को रिश्वत देने की कोशिश की। बीएआरसी के सीईओ ने बस इतना बताया कि यह घटना दक्षिण भारत के एक शहर की है। इसके अलावा उन्होंने कुछ जानकारी नहीं दी।

उन्होंने कहा, “लोग दक्षिण के किसी दूसरे शहर में घरों से संपर्क कर रहे हैं और उनसे दो ब्रॉडकास्टरों के दो कार्यक्रमों को देखने के लिए कहा जा रहा है। जाहिर है कि यह किसी और का खेल है।”

जब उनसे पूछा गया कि बीएआरसी ऐसे चैनलों का नाम लेकर उन्हें शर्मसार क्यों नहीं कर रहा तो दासगुप्ता का कहना था, “हम ज़रूर ऐसा करना पसंद करते, लेकिन इस बाबत ठोस सबूत जुटा पाना मुश्किल है। आधा भी मौका मिले तो हम ऐसा करने को तैयार हैं।”

उन्होंने यह भी खुलासा किया है कि एक मेट्रो शहर में बीएआरसी के 100 पैनल घरों के पतों की एक लिस्ट घुमाई जा रही थी। लेकिन इन 100 में से केवल सात घर ही बीएआरसी पैनल में थे। इस लिस्ट का पता लगते ही उन सात घरों को भी पैनल से हटा दिया गया।

दासगुप्ता का कहना था, “देश का एक महानगर है जहां लोग दावा करते हैं कि उनके पास 100 पैनल घरों के पतों की पूरी सूची है। लेकिन इनमें से केवल सात ही असल में बीएआरसी के सिस्टम का हिस्सा हैं। उन सात घरों की हमने शिनाख्त की और बीएआरसी के मीटर फौरन वहां से हटा दिए गए।”

बीएआरसी के सीईओ ने कहा कि ऐसी चीजें तो होती रहेगी। इसके मद्देनज़र परिषद ने इन घटनाओं पर नज़र रखने के लिए कुछ विजिलेंस एजेंसियों की सेवाएं ले ली हैं।

उन्होंने बताया,  “हमने दो या तीन सतर्कता एजेंसियों को काम पर लगा रहा है। जब भी कोई असामान्य डेटा आता है तो वे घर-घर जाते हमारे अपने लोगों पर नजर रखती हैं और उन घरों तक पहुंचनेवाले केबल ऑपरेटरों का भी पीछा करती हैं। इस तरह हम तीन या चार तरीकों से अंकुश रखते हैं।”

पारदर्शिता पर अपनी बात को साफ करते हुए दासगुप्ता ने कहा, “तीन हफ्ते पहले हम एक सार्वजनिक प्रकटीकरण किया कि हम कुछ स्थानों पर कुछ घरों को पैनल से हटा रहे हैं जिससे डेटा पर एक तरह से असर पड़ेगा। लेकिन इन घरों को हटाना ज़रूरी हो गया है क्योंकि कुछ लोगों द्वारा इन घरों को साधा जा चुका है।”

कुछ मल्टी-सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) को ज्यादा वजन मिला हुआ है जिससे उन्हें कैरेज़ फीस का बड़ा हिस्सा झटकने में मदद मिल जाती है। यह मुद्दा उठने पर दासगुप्ता ने स्वीकार किया है कि केबल ऑपरेटरों द्वारा अपने इलाके के पैनल घरों के बारे में पता लगाने से रोकने के बाबत परिषद ज्यादा कुछ नहीं कर सकती।

उनका कहना था, “अंततः यह एक भौतिक मीटर है। केबल ऑपरेटर उपभोक्ता घर जाता है तो उसे देख ही लेगा और जान जाएगा कि इस घर या उस घर में मीटर लगा हुआ है। आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते। जब भी हम ऐसा करेंगे तो हमेशा यही स्थिति आएगी।”

हालांकि इसके साथ ही उन्होंने कहा कि बीएआरसी ने ऐसी टेक्नोलॉज़ी का इस्तेमाल किया है जिससे पक्का हो जाए कि किसी को पैनल घरों का पता न लगे।

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दासगुप्ता ने कहा, “हमारे पास पूरा बैकेंड सिस्टम है जो हमें दिखा देता है कि गैर-प्राइमटाइम के घंटों या देर रात में दर्शकों के डेटा में असामान्य हरकत कब हुई है। एक पूरा एआई सॉफ्टवेयर है जो किसी भी असामान्य हलचल या बाहरी विसंगति को पकड़ लेता है।”

उन्होंने आगे बताया कि अगर किसी विशेष इवेंट की वजह से पैनल में असामान्य व्यवहार होता है तो उस घर को बाद में पैनल में वापस ले लिया जाता है; अन्यथा, उसे स्थायी रूप से बाहर कर दिया जाता है। तब तक, पैनल घर को निगरानी में रखा जाता है और उसका डेटा गणना में शामिल नहीं किया जाता। इस तरह के चेक के लिए 2000 अतिरिक्त घरों का उपयोग किया जाता है।

उन्होंने यह भी बताया कि इस समय शहरी इलाकों को ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा वजन मिला हुआ है। जहां 30 प्रतिशत मीटर ग्रामीण इलाकों में लगाए गए हैं, वहीं लगभग 70 प्रतिशत मीटर शहरी इलाकों में लगाए गए हैं।

इसका कारण यह है कि ग्रामीण इलाके सांस्कृतिक रूप से कमोबेश एक जैसे हैं तो कम मीटर से बेहतर प्रतिनिधित्व मिल जाता है। वहीं, शहरी इलाकों में भिन्नता होती है। इसलिए उनका बेहतर प्रतिनिधित्व हासिल करने में अधिक मीटरों की आवश्यकता होती है।

बीएआरसी की योजना हर साल पैनल में 10,000 घरों को जोड़ने की है। इससे अगले तीन साल में उसके पैनल में कुल 55,000 घर हो जाएंगी। यह बताते हुए दासगुप्ता ने ज़ोर देकर कहा, “आदर्श रूप से घरों की संख्या और ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन मसला यह है कि हमारा तंत्र कितना धन खर्च करने की स्थिति में है। भारत जैसी विविधता वाले देश के लिए 20,000-22,000 मीटर पर्याप्त नहीं हैं। हम और अधिक मीटर, अधिक व्यापक कवरेज और ज्यादा सघन डेटा की जरूरत है।”

बीएआरसी द्वारा ग्रामीण डेटा लाने के प्रभाव के बारे में बात करते हुए दासगुप्ता ने कहा कि चैनल जब विशिष्ट बाजारों की ज़रूरतों के हिसाब से पेश किए जाने लगेंगे तो टीवी प्रसारण उद्योग के अलग किस्म का सरणीकरण देखने को मिलेगा।

उनका कहना था, “कृपया इस बात के लिए तैयार रहें कि भारत के विभिन्न हिस्से अलग-अलग तरीके से बर्ताव करेंगे। बहुत सारे नए बाजार उभर रहे हैं। मेरे विचार से यह एक बड़ा अवसर है। अब तक लोग ग्रामीण इलाकों तक पहुंचने के लिए एक या दो ब्रॉडकास्टरों पर निर्भर थे। अब हम जानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में टीवी की खपत का क्या और कैसा स्वरूप है।”

उन्होंने कहा कि ग्रामीण और शहरी इलाके समग्र दर्शकों की संख्या को लगभग बराबर का योगदान करते हैं। साथ ही उनका कहना था कि अब ब्रॉडकास्टरों को तय करना है कि अपने बिजनेस मॉडल के हिसाब से उन्होंने किस बाजार को लक्ष्य करना है।

जब उनसे पूछा कि हकीकत में कितने मीटरों से जेटा मिल रहा है तो दासगुप्ता ने बताया कि मीटरों में ऐसी मेमोरी लगी रहती है जो 19 दिनों का डेटा रख सकती है। मीटर स्विट-ऑन न किए जाएं तो कोई डेटा नहीं तैयार होगा। जब बिजली वापस आती है तो मीटर फिर से डेटा देना शुरू कर देते हैं।

उन्होंने गुजरात और तमिलनाडु का उदाहरण दिया जहां विभिन्न वजहों से टीवी कि सिग्नल स्विच-ऑफ कर दिए गए। गुजरात में हार्दिक पटेल के आंदोलन और तमिलनाडु में चेन्नई की बाढ़ की वजह से। ऐसे मामलों में बीएआरसी साफ घोषणा कर देता है कि डेटा में वे दिन शामिल नहीं हैं जब टीवी चैनल उपलब्ध नहीं थे।

दासगुप्ता ने स्पष्ट किया, “अगर बिजली नहीं है या लोगों ने सेट-टॉप बॉक्स स्विच-ऑन नहीं किए हैं तो सारा कुछ डेटा से सामने आ जाता है।”

दासगुप्ता के मुताबिक, जॉनरों को जिस तरह वर्गीकृत किया जाता है, उसमें बदलाव आ गया है। नोट करने की बात यह है कि तेलुगू जीईसी की लगभग 40 प्रतिशत रेटिंग का योगदान फिल्में करती हैं, जबकि कुछ न्यूज़ चैनलों को 30-35 प्रतिशत रेटिंग अपने जीईसी कंटेंट से मिलती है।

उन्होंने यह भी कहा है कि उद्योग को पुराने आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेने से आगे बढ़ने की जरूरत है। उनका कहना था, “आपने कल जो देखा, वो कल के लिए सही नहीं हो सकता। हमारे उद्योग के कुछ सेगमेंट हैं जो अभी भी प्रतिगमन की लेखा पद्धति में विश्वास करते है। मूलतः जो कुछ भी अतीत में हुआ है, आप उसमें 9 प्रतिशत की वृद्धि कर देते हैं। लेकिन ऐसा सचमुच होता नहीं है। अतीत से भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता।”

उन्होंने दावा किया कि पिछली प्रणाली में डेटा का औसत निकाला जाता था या सामान्य बनाने के लिए उसमें से कुछ चीजें निकालकर सम कर लिया जाता था। लेकिन बीएआरसी डेटा जैसा बोलता है, उसे शब्दशः प्रस्तुत कर देता है।

उन्होंने कहा, “डेटा में वाजिब उतार-चढ़ाव होता है। यह सरल-सपाट नहीं होता।”

पिछली प्रणाली से दूसरा प्रमुख अंतर यह है कि अब एनसीसीएस सिस्टम अपनाया जा रहा है जहां दर्शकों का वर्गीकरण उनकी व्यय क्षमता पर आधारित है। यह उपभोक्ताओं का गलत प्रतिनिधित्व रोकने में मदद करता है।

उन्होंने अफसोस जताया कि जब डैस के पहले चरण को लागू किया गया था, तब उद्योग ने एक स्वर्णिम अवसर गंवा दिया। उन्होंने कहा कि एमएसओ द्वारा लगाए गए सेट-टॉप बॉक्सों (एसटीबी) का इस्तेमाल महज रिटर्न पाथ में एक छोटी-सी चिप और रिटर्न पाथ के लिए बैंडविड्थ में निवेश कर देने से डेटा की पैमाइश के लिए किया जा सकता है।

दासगुप्ता ने कहा,  “ऐसा हो जाता तो आज हम सैम्पल तक नहीं बैठे होते। हम संपूर्ण डेटा पर काम कर रहे होते। लेकिन ऐसा अब भी संभव है। अगर हम ऐसा नहीं करते तो डेटा असली स्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करेगा।”