लाइव पोस्ट

डिजिटाइज़ इंडिया: बेस पैक में सभी चैनल रखने का दबाव एआरपीयू बढ़ाने में बाधक

मुंबई: डिजिटल एड्रेसेबल सिस्टम (डैस) के पहले चरण पर अमल के तीन साल बीत चुके हैं। फिर भी प्रति यूज़र औसत आय (एआरपीयू) की सुई अभी तक खास कुछ हिली-डुली है। इसकी अहम वजह है ब्रॉडकास्टरों, मल्टी-सिस्टम ऑपरेटरों और स्थानीय केबल ऑपरेटरों (एलसीओ) के बीच आपसी समझ का न बन पाना।

एमएसओ और एलसीओ के बीच आय में हिस्सेदारी के मतभेद को अक्सर ज़मीनी स्तर पर पैकेजिंग की कमी की प्रमुख वजह बताया जाता है, लेकिन राष्ट्रीय एमएसओ के अधिकारियों का कहना है कि ब्रॉडकास्टरों द्वारा अपने चैनलों को बेस पैक में शामिल करने का आग्रह भी पैकेजिंग और टियरिंग को लागू करने में एक बड़ी बाधा है। हालांकि, ब्रॉडकास्टरों को लगता है कि एमएसओ को डायरेक्ट-टू-होम (डीटीएच) ऑपरेटरों से सीखना चाहिए कि प्रीमियम चैनलों को कैसे पैकेज़ किया और बेचा जाता है।

यह सार है दिल्ली में हाल ही में टेलिविज़न पोस्ट द्वारा आयोजित किए गए ‘डिजिटाइज़ इंडिया’ सम्मेलन के एक सेमिनार में हुई पैनल बहस का। बहस के इस सत्र का संचालन टेलिविज़न पोस्ट के सह-संस्थापक व एडिटर-इन-चीफ सिबाब्रता दास ने किया।

हैथवे केबल एंड डाटाकॉम में वीडियो बिजनेस के प्रेसिडेंट टी एस पानेसर ने कहा, “जब आपको बेस पैक में सारा कंटेंट पेश करने को मजबूर कर दिया जाता है तो आप दाम ऊपर जाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? आखिर ग्राहक क्यों और किस बात का ज्यादा दाम देगा? जब सभी कंटेंट प्रदाता विज्ञापन आय जुटाने के चक्कर में हर सब्सक्राइबर को कंटेंट दिखाना चाहते हैं तो एआरपीयू क्यों और कैसे जाएगा? यही कारण है कि पैकेजिंग को लागू करना मुश्किल हो गया है।”

delhi-event-inside-pannel-3

उनके अनुसार, उपभोक्ता के स्तर पर केबल टीवी की एआरपीयू डीटीएच के एआरपीयू जितनी ही अच्छा है और यह 250 रुपए के आसपास चल रही है।

उनकी बात का समर्थन पैनल चर्चा में शामिल सिटी केबल के कंटेंट व कैरेज़ प्रमुख बिभाष झा और जीटीपीएल हैथवे के सीओओ शाजी मैथ्यूज ने भी किया।

झा का कहना था, “हम 200 रुपए में सभी चैनल देते रहे हैं तो अब उसी उपभोक्ता के पास जाकर कम चैनलों के लिए ज्यादा दाम देने की बात कहना बेहद मुश्किल है। हमारे एलसीओ को इस कठिनाई का सामना करना पड़ता है। चूंकि ब्रॉडकास्टर बंधी हुई फीस के सौदे कर रहे हैं, इसलिए हमें सारे चैनल दिखाने पड़ते हैं।”

उन्होंने बताया कि यहां तक कि डीटीएच ऑपरेटर भी शुरुआती दिनों में सभी सब्सक्राइबरों को सारे चैनल परोस रहे हैं। उनका कहना था, “सबसे पहले उन्होंने एसडी चैनल पेश किए और उसके सात साल बाद एचडी चैनलों के साथ यही कर रहे हैं।”

मैथ्यूज ने कहा कि एआरपीयू तभी बढ़ेगी जब एमएसओ ब्रॉडबैंड और एचडी चैनल उपलब्ध कराने लगेंगे। उनका कहना था, “हमें ब्रॉडबैंड और एचडी उपलब्ध कराके अपनी पेशकश को बढ़ाना होगा। हम उन्हीं एसडी चैनलों को चलाते रहकर एआरपीयू को बढ़ाने की उम्मीद नहीं कर सकते।”

एक ब्रॉडकास्टर का नजरिया पेश करते एनडीटीवी में एफिलिएट सेल्स / बीडी व नेटवर्क डिस्ट्रीब्यूशन के प्रमुख राहुल सूद ने कहा कि चैनलों की टियरिंग ही एआरपीयू को बढ़ाने का इकलौता रास्ता है।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि एआरपीयू को बढ़ाने के लिए प्लेटफॉर्मों को कुछ समय की तकलीफ झेलनी पड़ेगी और इस सारे मसले को अलग करना पड़ेगा ताकि ब्रॉडकास्टर सारे पैकेज़ों को बेस पैक में डालने को बाध्य न कर सकें। अगर आप 200 रुपए में सारे चैनल दे रहे हैं तो ग्राहक के लिए 300 रुपए देने का कोई तुक नहीं है। आपको प्रीमियम चैनलों को अलग-अलग पैक में डाल देना चाहिए और उन्हें बेचने की कोशिश करनी चाहिए।”

उन्होंने यह भी कहा कि सब्सक्रिप्शन आय में वृद्धि का फायदा अभी तक छोटे ब्रॉडकास्टरों तक नहीं पहुंच रहा। वास्तव में, एनडीटीवी ने तो जब अपना खुद का डिस्ट्रीब्यूशन करना शुरू किया है, तब से उसकी सब्सक्रिप्शन आय घट गई है। उनका कहना था, “पहले हम मीडियाप्रो का हिस्सा थे तो हमें सब्सक्रिप्शन आय से काफी कुछ मिल जाता था। लेकिन बुक़े के बिखरने से सारा कुछ बहुत ज्यादा खिंच गया है।”

लेकिन पानेसर ने इसका विरोध करते हुए कहा कि एमएसओ के पास ब्रॉडकास्टरों के साथ किए गए करार के स्वरूप के चलते पैकेजिंग को तय करने की आज़ादी ही नहीं है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “मेरे पास चैनलों को पेश करने के लिए पैकेज़ बनाने की आजादी होनी चाहिए। हम बड़ी शिद्दत से यह बात सिस्टम में लाने की कोशिश कर रहे हैं।”

जहां सूद इस बात को लेकर पूरे आशान्वित थे कि कैरेज़ फीस बराबर घटती जाएगी, वहीं एमएसओ के प्रतिनिधियों ने कहा कि कैरेज़ कहीं नहीं जानेवाली है और बो बनी रहेगी।

सूद का कहना था, “हमारी कैरेज़ फीस कमोबेश ठहर चुकी है। हमने डैस के पहले चरण में इसमें बड़ी कमी देखी है क्योंकि असल में वो प्राइमरी मार्केट था। हमें अगले एकाध साल में इसमें और कमी आने की उम्मीद है।”

वहीं, पानेसर का कहना था कि ब्रॉडकास्टर अपने हर चैनल को हर पैकेज़ में रखनाना चाहते हैं। यह तथ्य ही अपने-आप में इस बात का संकेत है कि कैरेज़ फीस कहीं नहीं जानेवाली है। उन्होंने कहा, “मुझे तो लगता है कि कैरेज़ फीस स्थिर नहीं रहेगी, बल्कि आगे बढ़ने जा रही है। लेकिन अगर आप हमारे नेटवर्क की बात करें तो इसमें तमाम कारणों से कमी दर्ज की गई है।”

झा ने बताया कि सिटी केबल की कैरेज आय में काफी हद तक दायरा बढ़ने की वजह से 7 से 8 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा, “जब डैस का पहला और दूसरा चरण शुरू हुआ था तो कैरेज नीचे आ गया था। लेकिन अंततः सब लोग हर जगह उपस्थित रहना चाहते थे। इसलिए ब्रॉडकास्टर ने अलग रास्ता अपनाने का फैसला किया, लेकिन जैसे ही उसे अपनी पहुंच में गिरावट आती दिखी, वो एक निश्चित शुल्क पर समझौते की राह पर वापस आ गया।”

स्टार के रियो समझौते पर झा की बात पर सहमति जताते हुए पानेसर ने कहा कि ब्रॉडकास्टर का रियो के साथ अच्छा अनुभव नहीं रहा। उसकी विज़िबिलिटी प्रभावित हुई और वह निश्चित शुल्क के सौदों पर वापस चला गया।

मैथ्यूज़ ने तर्क दिया कि डिजिटलीकरण का उद्देश्य कैरेज शुल्क को कम करना नहीं है, बल्कि ग्राहकों को विकल्प प्रदान करने का है। उन्होंने कहा कि कैरेज शुल्क एक मार्केटिंग शुल्क है। ब्रॉडकास्टर अपने चैनलों की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अपनी मर्जी से कैरेज शुल्क का भुगतान करते हैं।

इस बार सूद ने भी सहमति जताई कि कैरेज शुल्क ब्रॉडकास्टर के बिज़नेस लक्ष्यों पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा एनडीटीवी ने उन नेटवर्क के साथ सौदे नहीं किए जहां उसे आरओआई नहीं दिखा। उन्होंने ट्राई के परामर्श पत्र का समर्थन किया जो ट्राई ने हाल ही में जारी किया है जिसमें क्या कैरेज शुल्क को विनियमित करने की ज़रुरत है इस मुद्दे पर हितधारकों से सुझाव की मांग की गई है।

उन्होंने कहा, “कैरेज शुल्क विनियमन की ज़रुरत है क्योंकि विज्ञापन समय सीमा है और विनियामक को समग्रता में चर्चा करने की ज़रुरत है। हम 15 से 20 मिनट विज्ञापन नहीं चलाना चाहते। अगर विकल्प मिले तो हम विज्ञापन मुक्त होने चाहेंगे या केवल 7 से 8 मिनट के विज्ञापन लेना चाहेंगे।”

उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि उपभोक्ताओं की खपत के व्यवहार में विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में तेज़ी से बदलाव हो रहा है। इसका मतलब है कि कंटेंट निर्माता अपने कंटेंट को कैरी करवाने के लिए पारंपरिक प्लेटफार्मों की दया पर निर्भर नहीं रह गए हैं।

पानेसर ने मैथ्यूज़ की इस बात का समर्थन किया कि एमएसओ कैरेज शुल्क के भुगतान के लिए ब्रॉडकास्टर को मजबूर नहीं करते। उन्होंने कहा, “मैं अपने नेटवर्क पर सभी चैनलों को कैरी कर सकता हूं, लेकिन मैं अपनी मर्जी से चैनलों को जगह दूंगा। अगर चैनल उपलब्ध है और ग्राहक उसे देखना चाहता है तो वह उसे देख सकते हैं।”

कई एमएसओ ने बताया कि सबस्क्रिप्शन आय इकट्ठा करने में एक प्रीपेड मॉडल होने से कठिनाइयां आती हैं।

पानेसर ने कहा, “केबल टीवी बिजनेस में प्रीपेड अभी तक प्रचलित मॉडल नहीं है क्योंकि टेक्नोलॉजी की वजह से पेमेंट गेटवे मुश्किल है। एलसीओ के लिए व्यावहारिक रूप से प्री-पेड शुरू करना संभव नहीं है।”

झा ने खुलासा किया कि सिटी केबल ने उसके एलसीओ को अनुमति दी है कि वे सेट-टॉप बॉक्स (एसटीबी) को सक्रिय और निष्क्रिय कर सकते हैं क्योंकि आखिरकार वे ही उपभोक्ताओं के साथ सौदा कर रहे हैं। एमएसओ ने अपने कुछ पैकेज कुछ समय के लिए प्रीपेड मॉडल पर रखे हैं।

मैथ्यूज़ ने कहा कि जीटीपीएल एक व्यवस्था तैयार कर रहा है जिसके तहत एलसीओ अपने दम पर प्री-पेड कर सकते हैं। उन्होंने यह बताया कि एमएसओ प्रीपेड आधार पर अलाकार्टे चैनलों की पेशकश कर रहा है। अलाकार्टे चैनल से आय एमएसओ और एलसीओ के बीच विभाजित की जाएगी और एलसीओ की आय का हिस्सा उसके एकाउंट में डाला जाएगा।

यह दलील देते हुए कि प्री-पेड मॉडल एक उपभोक्ता अनुकूल प्रणाली नहीं है, मैथ्यूज ने कहा कि यह उच्च एआरपीयू दे सकता है, लेकिन कुल मिलाकर आय कम होगी।

इसे भी पढ़े: