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डिजिटाइज़ इंडिया: हितधारकों ने डैस के तीन सालों के असर का हर पहलू से किया विश्लेषण

नई दिल्ली: डिजिटल एड्रेसेबल सिस्टम (डैस) ने टेलिविज़न ब्रॉडकास्टिंग क्षेत्र में तमाम सकारात्मक बदलाव किए हैं। फिर भी कुछ उलझने बाकी हैं जिनको सुलझाया जाना बाकी है। चेन्नई को छोड़कर बाकी सभी मेट्रो शहरों में डैस के पहले चरण के कार्यान्वयन के बाद तीन साल बाद भी प्रति यूज़र औसत आय (एआरपीयू) में अभी भी बढ़ने का रुख नहीं दिख रहा है।

एआरपीयू में वांछित वृद्धि न हो पाने को आय में हिस्सेदारी पर मल्टी-सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) और स्थानीय केबल ऑपरेटरों (एलसीओ) के बीच मची तकरार का कारण माना जा रहा है। इस तकरार से उपभोक्ता बिलिंग प्रक्रिया अटक गई है। केबल टीवी कामकाज़ बहुत सारे इलाकों में ठीक से जम नहीं पाया है कि एमएसओ ब्रॉडबैंड, मूल्य-वर्धित सेवाओं (वीएएस), एचडी चैनलों और पैकेज के स्तरीकरण पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन वक्त के साथ इन मुद्दों को भी सुलझा लिया जाएगा।

संक्षेप में ये वो बातें हैं जो टेलिविज़न पोस्ट द्वारा दिल्ली में इसी हफ्ते मंगलवार, 2 फरवरी को आयोजित डिजिटाइज़ इंडिया सम्मेलन में  पैनल चर्चा के दौरान सामने आईं। पैनल चर्चा का विषय था – तीन साल के डिजिटलीकरण का प्रभाव। इसमें उद्योग के शीर्ष अधिकारियों मे क्षेत्र में आ रहे बदलावों और आगे की राह पर खुलकर चर्चा की। चर्चा सत्र का संचालन रेटिंग एजेंसी इक्रा के वरिष्ठ ग्रुप वाइस-प्रेसिडेंट सुब्रता रे ने किया।

बहस की शुरुआत करते हुए रे ने कहा कि डैस के अमल के दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर लगभग 20,000 करोड़ रुपए का निवेश किया जा चुका है और अब इससे एमएसओ की बैलेंस शीट पर बने दबाव की चिंता की जा रही है। डिजिटलीकरण के लिए और भी पूंजी की ज़रूरत पड़ेगी। ऐसे में निवेश पर रिटर्न (आरओआई) और लाभप्रदता की स्थिति क्या है?

हैथवे केबल एंड डेटाकॉम के प्रबंध निदेशक व सीईओ जगदीश कुमार ने कहा कि केबल टीवी उद्योग को ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी पूंजी लगाने की जरूरत है।

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कुमार ने यह भी कहा कि ब्रॉडकास्टिंग क्षेत्र में निवेश स्टार इंडिया, वायकॉम18 और डिज्नी इंडिया जैसे अनेक भारतीय ब्रॉडकास्टरों के संपन्न प्रभुत्व के चलते होता जा रहा है।

कुमार ने कहा, “हम डिस्ट्रीब्यूशन क्षेत्र में एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) व्यवस्था को उदार बनाने को लेकर काफी सकारात्मक हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी निवेशक विभिन्न संरचनात्मक मुद्दों की वजह से टीवी डिस्ट्रीब्यूशन बिजनेस की व्यवहार्यता को लेकर चिंतित हैं। डिजिटलीकरण के तीन चरणों के बाद एमएसओ की बैलेंस शीट पहले से ही काफी ज्यादा खिंच चुकी है।

वैसे तो अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। फिर भी डैस के कुछ फायदे मिलने लगे हैं। सिटी केबल में कंटेंट व कैरेज़ के प्रमुख बिभाष झा ने चर्चा के दौरान कहा कि एमएसओ डिजिटलीकरण की वजह से अब स्थानीय केबल ऑपरेटरों (एलसीओ) से ज्यादा धन इकट्ठा कर ले रहे हैं क्योंकि डिजिटलीकरण से ग्राहक आधार में पारदर्शिता आ गई है।

झा का कहना था,  “एनालॉग के दौर में, हम डैस के आने के बाद जो धन जुटा ले रहे हैं, उसका दसवां हिस्सा भी नहीं जुटा पा रहे थे। एनालॉग पूरी तरह से कैरेज़ से संचालित होता था।”

उन्होंने कहा कि एमएसओ अपनी एआरपीयू बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एमएसओ डैस के पहले चरण के इलाकों में एलसीओ से प्रति सब्सक्राइबर 90 से 100 रुपए और दूसरे चरण के इलाकों में 60 से 70 रुपए जुटा ले रहे हैं। तीसरे चरण में एमएसओ 30-40 रुपए ही मिलेंगे। लेकिन जिसे भविष्य में बढ़ाया जा सकता है।

लेकिन डिज्नी मीडिया नेटवर्क्स के वीपी और आय प्रमुख निखिल गांधी का कहना था कि डिजिटलीकरण के बावजूद एआरपीयू बढ़ी नहीं है। उन्होंने कहा कि यह ब्रॉडकास्टरों के लिए चिंता का संकेत है जो दर्शकों के बीच प्रासंगिक बने रहने के लिए बेहद उम्दा किस्म का कंटेंट बनाने पर जमकर निवेश कर रहे हैं।

गांधी ने कहा, “पिछले दशक के दौरान ब्रॉडकास्टरों ने कंटेंट में निवेश किया है। ब्रॉडकास्टरों के लिए, उपभोक्ता उनके बिजनेस के एकदम केंद्र में है। कंटेंट में निवेश एक सतत प्रक्रिया है। अंत में निवेश का औचित्य आरओआई (निवेश पर रिटर्न) के साथ साबित करना होगा।”

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केबल टीवी क्षेत्र की लाभप्रदता के लिए एआरपीयू को ऊपर ले जाने की जरूरत है। लेकिन सिटी केबल के बिभाष झा का कहना था कि एमएसओ एक दूसरे के हलके को नहीं हड़पने की संधि का पालन करते हुए प्रति यूज़र औसत आय (एआरपीयू) बढ़ाने के लिए आपक में सहयोग कर रहे हैं।

झा ने आगे कहा, “लंबे समय में एआरपीयू लाभप्रदता बढ़ाने में अहम रोल अदा करेगी। भविष्य में केबल टीवी के अलावा ब्रॉडबैंड से मिलनेवाली एआरपीयू भी काफी होगी।”

फास्टवे ट्रांसमिशन के सीईओ पीयूष महाजन ने कहा कि एआरपीयू को ग्राहक के स्तर पर उठाना पड़ेगा।

उन्होंने इसके लिए एलसीओ को विश्वास में लेने के महत्व पर भी ज़ोर दिया। उनका कहना था कि केबल टीवी के एआरपीयू में वृद्धि से एमएसओ को मूल्य-वर्धित सेवाओं व ब्रॉडबैंड में निवेश करने में मदद मिलेगी।

ऑरटेल कम्युनिकेशंस के प्रेसिडेंट व सीईओ बिभु प्रसाद रथ ने एआरपीयू के मुद्दे पर पैनल के अपने साथियों से भिन्न राय रखी। रथ ने कहा कि डैस का ध्येय कभी भी एआरपीयू को बढ़ाने का नहीं था; बल्कि, इसका मकसद उपभोक्ता को विकल्प उपलब्ध कराना था।

रथ ने कहा कि एआरपीयू डिजिटलीकरण के बाद नीचे जा सकती है, खासकर तब, जब सचमुच की एड्रेसेबिलिटी लागू हो जाएगी। एड्रेसेबिलिटी आने पर उपभोक्ता के सामने विकल्प होगा कि वो वांछित चैनल ही ले और जिन्हें नहीं चाहता, उन चैनलों को हटा दे।

उनका कहना था, “ग्राहक को सभी चैनलों की ज़रूरत नहीं होती। जब पूरी एड्रेसेबिलिटी आ जाएगी तो एआरपीयू पर दबाव बढ़ जाएगा। कुछ लोग ज्यादा मूल्य के पैकेज़ चुनेंगे, जब कुछ लोग कम-मूल्य के पैकेज़ लेने लगेंगे। इससे हो सकता है कि औसत मूल्य ऊपर ही न जाए। केबल टीवी बिजनेस एआरपीयू से नहीं, बल्कि बाज़ार से संचालित होता है।”

रथ ने यह भी कहा है कि केबल टीवी बिजनेस तब सफल होगा जब एमएसओ वीडियो के ऊपर बहुत सारी सेवाएं देने लगेंगे। इसके लिए उससे कई गुना ज्यादा निवेश की ज़रूरत होगी जितना अभी तक एमएसओ ने डैस के अंतर्गत निवेश किया है।

सेट-टॉप बॉक्स (एसटीबी) अब से कई सालों बाद अप्रासंगिक हो जाएगा। उन्होंने अमेरिका के बाजार का उदाहरण दिया जहां कॉमकास्ट के ब्रॉडबैंड ग्राहकों की संख्या वीडियो ग्राहकों से ज्यादा हो गई है।

भुवनेश्वर के अपने ही बाजार में ऑरटेल की ब्रॉडबैंड एआरपीयू उसके केबल टीवी एआरपीयू से अधिक है।

सुब्रता रे ने पहले कहा था कि बाजार में ज़रूरत से बहुत ज्यादा चैनल हो गए हैं। इस पर निखिल गांधी का कहना था कि अधिक चैनल बाज़ार की ज़रूरत है। उपभोक्ताओं के पास अंततः चुनने का विकल्प होना चाहिए।

गांधी से सहमति जताते हुए इंडिया टीवी के सीईओ पारितोष जोशी ने बताया है कि महज दस लाख की आबादी वाले देश क्रोएशिया में तीन डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म और 85 चैनल है। जोशी का मानना है कि भारत में अभी भी बहुत सारे चैनलों को लाने की गुंजाइश है। उन्होंने कहा कि समस्या यह नहीं है कि बहुत सारे चैनल हैं, बल्कि यह है कि बहुत सारे चैनल एक जैसे हैं।

जोशी ने कहा,  “भिन्न किस्म की पेशकश आगे के लिए बहुत अहम है। अमेरिका में स्थानीय न्यूज़ स्टेशन बन गए हैं। केबल टीवी के डिजिटलीकरण के लिए बहुत ज्यादा लोकल होने की स्थितियां तैयार कर दी हैं। ऐसे में बहुत ज्यादा चैनलों के सिद्धांत का कोई मतलब नहीं है।”

डिजिटल दुनिया में लीनियर चैनलों की परिभाषा ही बदल जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर माल सही है तो कीमत अब कोई मुद्दा नहीं रह गई है।

‘मस्ट प्रोवाइड’ के मुद्दे को उठाते हुए जोशी ने कहा कि इससे अब मुक्ति पा लेनी चाहिए। उनका कहना था, “मुक्त बाज़ार में ब्रॉडकास्टरों को अपने सिग्नल देने की आज़ादी होनी चाहिए। अगर डिस्ट्रीब्यूटर चैनल चाहते हैं तो वे ब्रॉडकास्टरों से संपर्क कर सकते हैं और व्यावसायिक वार्ता शुरू कर सकते हैं।”

ऑरटेल के सीईओ रथ ने ब्रॉडकास्टरों को चुनौती दी कि अगर वे अपने कंटेंट को लेकर इतने आश्वस्त हैं तो उसे अ ला कार्टे आधार पर डाल दें। उनका कहना था, “तीसरे चरण में मैंने ब्रॉडकास्टरों से कहा कि वे अपने चैनल रियो (रेफरेंस इंटरकनेक्ट ऑफर) पर डाल दें और मैं उनकी पेशकश को प्रमोट करने के लिए अभियान चलाऊंगा। लेकिन ब्रॉडकास्टर अपने उत्पादों के परीक्षण के लिए आगे नहीं आए।”

रथ से भिन्न राय जताते हुए हैथवे के कुमार ने कहा कि केबल में निश्चित रूप से एआरपीयू बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि केबल को छोड़कर हर दूसरी चीज़ के दाम बढ़ गए हैं। उन्होंने कहा कि इसे हासिल करने का एक उपाय एआरपीयू को बढ़ाना और दूसरा उपाय ब्रॉडकास्टरों के साथ वाजिब समझौता करना है।

उन्होंने दावा किया, “चयन का विकल्प पेश करने और पारदर्शिता लाने से एआरपीयू बढ़ जाएगी।”

कुमार ने यह भी तर्क दिया कि भारत भिन्नताओं से भरा देश है और यहां और भी ज्यादा चैनलों की ज़रूरत है। कंटेंट में वैविध्य आवश्यक है। बैंडविड्थ बढ़ जाने से एमएसओ को ज्यादा कंटेंट लाने का माकूल मौका मिल जाएगा।

डीटीएच के साथ प्रतियोगिता के मुद्दे पर झा ने कहा कि केबल तंत्र अंततः डैस तक पहुंचता है। ग्राहकों को जोड़े रखने में एलसीओ द्वारा प्रदान की सेवा ने बड़ी भूमिका निभाई है। डिज्नी के गांधी ने कहा कि एलसीओ द्वारा प्रदान की जानेवाली क्रेडिट सुविधा से बहुत फायदा मिलता है।

फास्टवे के महाजन ने बताया है कि तीन साल पहले पंजाब में डीटीएच के 12 लाख ग्राहक थे, जबकि इस बाज़ार के प्रमुख खिलाड़ी फास्टवे के पास भी 12 लाख ग्राहकों का अनुमानित आधार था। तीन साल बाद, डीटीएच ने केवल 3 लाख ग्राहक जोड़े हैं, जबकि केबल ने 12 लाख ग्राहकों को जोड़ा है।

सरकार को डिजिटलीकरण से फायदा हुआ है। कुमार ने बताया कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में केबल टीवी से मनोरंजन टैक्स का संग्रह 20 लाख रुपए से बढ़कर 5 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तावित वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) उद्योग के लिए अच्छा है और इससे आय बचाने में मदद मिलेगी।

वहीं महाजन का कहना था कि समेकन के कारण राष्ट्रीय स्तर पर अभी से चार साल बाद केवल 10-12 एमएसओ ही रह जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि एमएसओ तभी जाकर सही मूल्य हासिल कर पाएंगे, जब वे ब्रॉडबैंड पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे।

ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्मों के उभार पर कुमार का कहना था कि ये सेवाएं पारंपरिक प्लेटफॉर्मों को कोई चुनौती नहीं देतीं। अमेरिका में केबल टीवी के दाम बहुत ही ज्यादा हैं। इससे लोग कनेक्शन कटवाकर नेटफ्लिक्स जैसी सेवाओं की तरफ जाने को मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नेटफ्लिक्स जैसी सेवाओं के भारत में आने से डेटा विस्फोट की स्थितियां जन्म लेंगी।

झा ने कहा कि 4जी सेवाओं के आने एमएसओ पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि एमएमओ 70 से 75 एमबीपीएस तक की स्पीड देने में सक्षम हैं, जबकि 4जी में केवल 50 एमबीपीएस तक की स्पीड दी जा सकती है।

वहीं, कुमार का कहना था कि टेलिकॉम कंपनियों को आवंटित किया गया स्पेक्ट्रम लीनियर टीवी की सेवा नहीं दे सकता। अगर हम काल्पनिक स्थिति मान लें कि सभी उपभोक्चा विश्व कप को 4जी नेटवर्क पर देखें तो सारा 4जी स्पेक्ट्रम ही भसक जाएगा।