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ट्राई को ऐसे कायदे बनाने चाहिए जो सभी हितधारकों के लिए उचित और संतुलित हों: जवाहर गोयल

नई दिल्ली: भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) को अपने नियम-कायदे ऐसे बनाने चाहिए जो डिस्ट्रीब्यूशन तंत्र के सभी हितधारकों के लिए उचित और संतुलित हों। डिश टीवी के प्रबंध निदेशक जवाहर गोयल ने यह बात कही है।

गोयल ने दिल्ली में टेलिविज़न पोस्ट के डिजिटाइज़ इंडिया सम्मेलन में मुख्य भाषण देते हुए कहा कि ट्राई को उपभोक्ता जैसी सोच व दिमाग के साथ कायदे नहीं बनाने चाहिए।

गोयल का कहना था, “ट्राई को ऐसे कायदे बनाने चाहिए जो हर किसी के हित में हों। अगर आप उपभोक्ता की तरह हमें नियमित करोगे तो सेवा प्रदाता मारा जाएगा। और, जब कोई सेवा प्रदाता ही नहीं होगा तो कोई उपभोक्ता भी नहीं रह जाएगा।”

Jawahar_Goel-event1उन्होंने कहा, “मैंने कई बार देखा है कि नियामक संस्था उपभोक्ता की तरह बर्ताव करती है और विनियमन का काम वाजिब तरीके से नहीं करती।”

गोयल ने ‘मस्ट प्रोवाइड’ क्लॉज़ की वकालत की और कहा कि ‘चैनल दिखाना ही है’ का यह उपबंध समय की कसौटी पर खरा उतरा है और इसे लागू रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि टैरिफ विनियमन के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए क्योंकि उद्योग अभी तक परिपक्व नहीं हुआ है।

गोयल ने ज़ोर देते हुए कहा, “डिस्ट्रीब्यूशन उद्योग और ब्रॉडकास्टरों के बीच के हज़ारों मामले चल रहे हैं।

लोग कैसे कह सकते हैं कि उद्योग परिपक्व हो गया है और हमें टैरिफ की व्यवस्था और ‘मस्ट प्रोवाइड’ क्लॉज़ हटा देना चाहिए? जो कोई भी लॉबी करनेवाला इसकी कोशिश करेगा, मैं आगे बढ़कर उसका विरोध करूंगा।”

Jawahar_Goeleventउन्होंने यह भी कहा कि ‘मस्ट प्रोवाइड’ क्लॉज़ और टैरिफ विनियमन को हटाने के किसी भी प्रयास के खिलाफ पूरे डिस्ट्रीब्यूशन उद्योग को एकजुट करेंगे।

गोयल ने अतीत की बात याद करते हुए बताया कि किन परिस्थितियों में ‘मस्ट प्रोवाइड’ क्लॉज़ को अधिनियमित किया गया था।

उन्होंने कहा, “उस क्लॉज़ को तब बनाया गया था, जब कुछ ब्रॉडकास्टरों ने डिश टीवी को अपने चैनल देने से मना कर दिया था। एक स्थानीय केबल ऑपरेटर (एलसीओ) को एक मल्टी-सिस्टम ऑपरेटर (एमएसओ) के खिलाफ एक याचिकाकर्ता के रूप में मैने खड़ा किया था। एलसीओ ने अदालत को बताया कि एमएसओ अनुरोध के बावजूद सिग्नल नहीं दे रहा।”

टीडीसैट ने अंततः एलसीओ के पक्ष में फैसला सुनाया कि एमएसओ सिग्नल देने से मना नहीं कर सकता।

गोयल कानूनी लड़ाई आगे ले गए और सफलतापूर्वक मामलों को लड़ते हुए डिश टीवी के लिए ब्रॉडकास्टरों से कंटेंट प्राप्त करने में कामयाब रहे।

“उसके बाद मस्ट प्रोवाइड विनियमन अस्तित्व में आया था” – यह याद करते हुए गोयल ने बताया कि उस क्लॉज़ ने एकाधिकार के खिलाफ बाधा के रूप में काम किया था।

उन्होंने कहा, “कई ब्रॉडकास्टर एक एमएसओ को कंटेंट नहीं देना चाहते क्योंकि वे किसी दूसरे की मदद करना चाहते हैं। तो ‘मस्ट प्रोवाइड’ एकाधिकार से बचने का रास्ता है।”

गोयल ने कहा कि जो लोग ‘मस्ट प्रोवाइड’ क्लॉज़ को हटाने की बात कर रहे हैं वो एकाधिकार के हिमायती हैं। उन्होंने कहा, “मस्ट प्रोवाइड एकाधिकार के खिलाफ एक सुरक्षा वाल्व है। यह पिछले 12-13 सालों से चल रहा है।”

गोयल ने कंटेंट के मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता की कमी की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा, “ब्रॉडकास्टर का मूल्य निर्धारण वास्तविक मूल्य निर्धारण नहीं है। पहले कोई रेट कार्ड नहीं था। वर्तमान में भी कोई रेट कार्ड नहीं है। अगर कुछ चैनल रियो पर 5 रुपए में उपलब्ध हैं तो ऐसे हज़ारों मामले हैं जहां चैनल कुछ को 5 रुपए में उपलब्ध हैं तो कुछ को अन्य मूल्य पर उपलब्ध हैं।”

उन्होंने ब्रॉडकास्टर द्वारा डिस्ट्रीब्यूटरों को सैर पर ले जाने की प्रथा का भरपूर विरोध किया। उन्होंने कहा, “ट्राई को उस पैसे को भी गिनना चाहिए जो संतुष्टि के तौर पर दिया जाता है। अगर कोई कमर्शियल संबंध है तो वहां संतुष्टि की बात नहीं होनी चाहिए। अन्यथा, इसे (फोरेन करप्ट प्रैक्टिसेज़ एक्ट) एफसीपीए के तहत कवर किया जाना चाहिए।”

गोयल ने इस तथ्य पर दुख जताते हुए कहा कि केबल टीवी उद्योग के शुरुआती दिनों में प्रबल फलसफा ‘ताकतवर ही सही है’ अभी भी खूब चल रहा है। उन्होंने कहा, “2003-04 में बाहुबली एमएसओ या एलसीओ ने हमारे डिस्ट्रीब्यूटर को शौचालय में बंद कर दिया था और उसे छह घंटे तक बंदी रखा था। तब मुझे हस्तक्षेप करना पड़ा। यह घटना हैदराबाद में हुई थी।”

डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्मों और पे-चैनलों के बीच लड़ाई अब कैरेज फीस के मुद्दे पर आ गई है। उन्होंने डिस्ट्रीब्यूशन बिरादरी से आह्वान किया कि वे सरकार से आग्रह करे कि अन्य कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्मों की तरह ओवर-द-टॉप (ओटीटी) सेवाओं को भी विनियामक ढांचे के तहत लाया जाए।

उन्होंने कहा, “डिस्ट्रीब्यूशन बिरादरी को ओटीटी, आईपीटीवी जैसे नए डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्मों को विनियमित करने के लिए सरकार पर दबाव डालना चाहिए। इन्हें आईएसपी लाइसेंस के तहत कवर किया जा सकता है लेकिन कंटेंट के डिस्ट्रीब्यूशन के लिए कोई नियम नहीं है। वे इस देश में टैक्सों का भुगतान के बिना अपनी सारी आय को देश से बाहर ले जा सकते हैं। एक उद्योग के रूप में हमें इसके खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज़ उठानी चाहिए।”

जो ब्रॉडकास्टर अपने ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर फ्री में कंटेंट की पेशकश कर रहे हैं, उनसे गोयल ने पूछा कि वे तय करें कि वे डिस्ट्रीब्यूटर हैं या कंटेंट बनानेवाले और वे विज्ञापन आय के मॉडल या अफिलिएट आय मॉडल में से किसका अनुसरण कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “केबल और डीटीएच उद्योग ब्रॉडकास्टर को भारी मात्रा में भुगतान करते हैं, लेकिन वही ब्रॉडकास्टर अपने ओटीटी प्लेटफार्मों पर फ्री में अपना प्रीमियम कंटेंट देता है। ब्रॉडकास्टिंग में मेरे सहयोगियों को समझना चाहिए कि कैसे अपने चैनलों को डिस्ट्रीब्यूट किया जाना चाहिए। यदि आप सीधे घरों में जाकर अपने चैनलों को डिस्ट्रीब्यूट करते हैं तो हमें कोई समस्या नहीं। लेकिन अगर वे हमारे द्वारा डिस्ट्रीब्यूट कर रहे हैं तो उन्हें ये भेदभावपूर्ण तरीके नहीं अपनाने चाहिए।”

गोयल ने आरोप लगाया कि ट्राई द्वारा की गई 27.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी इच्छुक पार्टियों द्वारा लॉबीइंग या पैरवी का परिणाम था। इसे टीडीसैट ने खारिज कर दिया है और सुप्रीम कोर्ट ने भी टीडीसैट के फैसले को बरकरार रखा है। उन्होंने ट्राई से आग्रह किया कि वह ऐसे नियम बनाए जो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए फायदेमंद हों।

उन्होंने अफसोस ज़ाहिर करते हुए कहा, “विनियमन (27.5 प्रतिशत मूल्य वृद्धि) उस समय अचानक आया था जब कोई और विनियमन का मसौदा तैयार कर रहा था। 27.5 प्रतिशत की मुद्रास्फीति से जुड़ी बढ़ोतरी उन चैनलों के लिए थी जिन्होंने छह महीने पहले जन्म भी नहीं लिया था। इस तरह की कीमतों में वृद्धि को कानून की अदालत में धूल चाटनी ही थी।”

गोयल ने विनियामक की प्रशंसा भी की। उन्होंने कहा, “एक दशक से भी अधिक समय के बाद, उद्योग के समक्ष कुछ विनियमन, सही व गलत की और ज़िम्मेदारी की भावना प्रस्तुत की गई है। हालांकि, हम वहां नहीं पहुंचे हैं जहां हमें होना चाहिए था।”