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न्यूज़ चैनलों के स्वामित्व, केबल डिजिटलीकरण, एफएम रेडियो पर राय प्रसारण सचिव की

मुंबई: सरकार संदिग्ध हितों वाले न्यूज़ चैनलों पर शिकंजा कसने की बेहतर स्थिति में नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर उसके ऊपर उद्योग के मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगेगा। इसके बजाय उद्योग के अपने निकाय को इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया चाहिए। यह कहना है सूचना एवं प्रसारण सचिव सुनील अरोड़ा का।

असल में स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर ने सवाल पूछा था कि टीवी न्यूज़ उद्योग में धूर्त व गलत तत्वों की मौजूदगी पर सरकार की क्या राय है? इसके जवाब में अरोड़ा ने पलटकर गेंद उदय शंकर के ही पाले में डालते हुए पूछ डाला कि इसे रोकने के लिए उद्योग के निकाय क्या भूमिका निभा रहे हैं।

उनका कहना था, “अगर सरकार उन पर शिकंजा कसती है तो यह सरकार का हस्तक्षेप होगा। लोग पूछेंगे कि सरकार ऐसा क्यों कर रही है।”

अरोड़ा ने यह भी कहा कि पूंजी निवेश पर सीमा बांधना कोई अच्छा विचार नहीं है क्योंकि जो लोग अपने बिजनेस हितों के लिए न्यूज़ चैनलों का उपयोग कर रहे हैं, वे बड़ी तिजोरियों वाले लोग हैं। उनका कहना था, “हम यही कर सकते हैं कि उद्योग निकायों को हाशिए के उन तत्वों के प्रति बहुत कठोर बना दें जो न्यूज़ चैनलों के ज़रिए अपने व्यावसायिक हित साधने की कोशिश कर रहे हैं।”

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अरोड़ा ने कहा कि सरकार टीवी उद्योग, विशेष रूप से स्टैंडअलोन न्यूज़ चैनलों की व्यवहार्यता या उनके टिक रह पाने को लेकर चिंतित है।

सूचना एवं प्रसारण सचिव ने फिक्की फ्रेम्स 2016 में एक चर्चा में भाग लेते हुए कहा, “हम उद्योग, खासकर स्टैंडअलोन न्यूज़ चैनलों की व्यवहार्यता को लेकर बहुत चिंतित हैं। इस समय वहां कई बड़े मीडिया हाउस हैं जो घाटे में चल रहे चैनलों को सब्सिडाइज़ कर सकते हैं। लेकिन मनोरंजन चैनलों सहित छोटे चैनलों की वित्तीय सेहत अच्छी नहीं चल रही है।”

लेकिन इसी सांस ने उन्होंने यह भी कह डाला कि उद्योग को यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि सरकार उन्हें या उनके बिजनेस को चलाने में मदद करने जा रही है। उनका कहना था, “तय कर लिया जाए कि बिजनेस को बाज़ार के सिद्धांतों पर चलाना है या उसे सरकार की उंगली पकड़कर चलना है।”

एक और सवाल है कि क्या सरकार को सहयोग करना बंद कर देना चाहिए। उन्होंने कहा, “जहां कहीं भी सरकार के सचेत हस्तक्षेप की ज़रूरत है, उसे किया जाना चाहिए और ऐसा करना ही होगा। लेकिन इसके साथ ही सरकार से किसी के लिए किसी बिजनेस को चलाने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या टेक्नोलॉज़ी रेग्युलेशन की तुलना में कहीं ज्यादा आगे निकल गई है तो अरोड़ा ने इसे स्वीकार करते हुए कहा, “कुछ बुनियादी चीजें तो बनी रहेंगी; अन्यथा, आपको क्या लगता है कि वॉशिंग्टन डीसी में क्यों इतने सारे लॉबीइंग करने वाले हैं?”

जब उदय शंकर ने जिक्र किया कि कैसे नए ज़माने की इंटरनेट सेवाएं रेग्युलेशन को निष्प्रभावी बना दे रही हैं। इस पर प्रसारण सचिव अरोड़ा का कहना था, “अगर आप उबर या ओला की बात ले लें तो क्या आपको लगता है कि जो टैक्सी चला रहा है, उसे अगर ड्राइव करना नहीं आता तो इसकी इजाज़त दी जाती? उसे ड्राइविंग लाइसेंस के तथाकथित नियमों के तहत ही गाड़ी चलाने की अनुमति दी जाएगी।”

उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि जब भी राष्ट्र के हित या सुरक्षा को खतरा होगा तो सत्ता तंत्र हस्तक्षेप करेगा। उनका कहना था, “एक सिविल सर्वेंट और एक नागरिक के रूप में मैं न्यूनतम रेग्युलेशन चाहता हूं। लेकिन अगर कोई इंटरनेट पर ऐसी चीज़ शुरू करता है जो इंटरनेट सुरक्षा के लिए खतरा है तो क्या आपको लगता है कि सिस्टम हस्तक्षेप नहीं करेगा?”

उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा मंजूरी, जो टीवी चैनल के लाइसेंस जैसी विभिन्न अनुमतियों को जकड़े हुई थी, उससे निजात पा ली गई है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने पिछले छह महीनों में पिछले तीन सालों से भी ज्यादा मंजूरियां दी हैं।

उन्होंने बताया, “सुरक्षा मंज़ूरी के बारे में मेरी दो बैठकें वर्तमान गृह सचिव के साथ हुईं। केंद्रीय गृह मंत्रालय सुरक्षा मंज़ूरी की व्यवस्था को उदार बनाकर अपनी तरफ से चीज़ों की रफ्तार बढ़ाने के लिए राजी हो गया है। यह आगे देखने का दृष्टिकोण है। हमें चीजों को उनके संगत निष्कर्ष तक पहुंचाना होगा ताकि उनमें लगनेवाला समय और कम किया जा सके।”

सरकार तमाम अड़चनों के बावजूद डिजिटलीकरण को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा, “हम डिजिटलीकरण के लिए प्रतिबद्ध हैं। कुछ केबल एसोसिएशनों ने इसे चुनौती दी और डैस (डिजिटल एड्रेसेबल सिस्टम) के तीसरे चरण की समय सीमा पर स्टे-ऑर्डर पा लिया। हमने इन मामलों को एक साथ करके सुप्रीम कोर्ट में स्थगन आदेश को चुनौती दी है। हम प्रक्रिया को रोकना नहीं चाहते।”

स्वदेशी सेट-टॉप बॉक्स (एसटीबी) के मुद्दे पर अरोड़ा ने कहा कि उन्होंने कैबिनेट सचिव से मुलाकात की और उनसे अनुरोध किया कि एसटीबी, ‘मेक इन इंडिया’ पहले के एक भाग के रूप में इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का एक महत्वपूर्ण वर्टिकल होना चाहिए। उन्होंने कहा, “वे सहमत हो गए हैं लेकिन उद्योग को एक बड़ी भूमिका निभानी होगी।”

अरोड़ा ने भी भारतीय एसटीबी की कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सेदारी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि उद्योग इसे मेक इन इंडिया पहल के तहत देखे और इलेक्ट्रॉनिक्स मेन्यूफैक्चरिंग योजना के तहत भारत में एसटीबी का उत्पादन करे।”

हाल ही में एफएम रेडियो के तीसरे चरण की ई-नीलामी से सीख लेते हुए, मंत्रालय लॉक-इन और रिजर्व कीमत के जैसे प्रस्तावों के बारे में कैबिनेट को सिफारिशें करने जा रहा है। उन्होंने कहा, “हमने लॉक-इन अवधि और आरक्षित मूल्य जैसे मुद्दों पर एफएम के तीसरे चरण की नीलामी से सीख ली है। हम जल्द ही हमारे प्रस्तावों के साथ कैबिनेट के पास जाएंगे।”

निजी एफएम रेडियो ब्रॉडकास्टर तीन साल के लॉक-इन क्लॉज़ और इस बात से दुखी हैं कि इस दौरान वे 51% से नीचे  नहीं जा सकते।

अरोड़ा ने यह भी कहा कि मंत्रालय ने मीडिया और मनोरंजन के क्षेत्र में बिजनेस करने की आसानी को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

अरोड़ा का कहना था, “हमारा एक प्राथमिक उद्देश्य है कि शास्त्री भवन में आनेवाले लोगों की संख्या काफी कम कर दी जाए। कम विनियमन और भारत को मीडिया व मनोरंजन का केंद्र बनने की गति को तेज़ करने में हम लगे हुए हैं।”

बिजनेस करने की आसानी पर फोकस करते हुए अरोड़ा ने सूचित किया कि राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) में एक फिल्म सुविधा केन्द्र कार्यालय खोल दिया गया है जो फिल्म संबंधी मंजूरी के लिए एकल खिड़की सेवा के रूप में काम करेगा।

सचिव ने कहा कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के हिस्से के रूप में एक पुरस्कार बनाया गया है जो फिल्मों के सबसे ज्यादा अनुकूल राज्यों को दिया जाएगा। 2016 में गुजरात को फिल्मों के लिए सबसे अनुकूल राज्य पाया गया है। उत्तर प्रदेश और केरल का स्थान ठीक उसके बाद है।

उन्होंने यह भी बताया कि मुंबई में एनिमेशन, गेमिंग व विजुअल इफेक्ट्स में उत्कृष्टता का राष्ट्रीय केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। महाराष्ट्र सरकार इस केंद्र के लिए गोरेगांव में फिल्म सिटी के पास में 25 एकड़ भूमि उपलब्ध करा रही है।

सूचना एवं प्रसारण सचिव ने यह भी कहा कि सरकार ने राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन के लिए 598 करोड़ रुपए का अनुमोदन कर दिया है। इसका मकसद भारत की समृद्ध फिल्म व सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना और बढ़ावा देना है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय सिनेमा का एक राष्ट्रीय संग्रहालय मुंबई में पेडर रोड पर फिल्म प्रभाग परिसर में बन रहा है। उन्होंने बताया, “प्रधानमंत्री ने इस संग्रहालय में गहरी रुचि दिखाई है। इसे कोलकाता की नेशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूज़ियम द्वारा क्यूरेट किया जा रहा है।”