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डिजिटल प्लेटफॉर्मों से दाम निकालना है बड़ा कठिन

मुंबई: डिजिटल माध्यम लोगों को यह फैसला करने की ताकत देता है कि उन्हें कब और क्या देखना या पढ़ना है। वैसे तो यह माध्यम विशाल आकार ले चुका है। लेकिन अभी तक अधिकांश विज्ञापनदाता इस पर उतना खर्च नहीं कर रहे हैं, जितना उन्हें करना चाहिए।

इस उद्योग के सभी हितधारकों – कंटेंट सर्जकों से लेकर नए मीडिया प्लेटफॉर्म के मालिकों के बीच इस बात आम सहमति है कि इस गतिशील मंच को मोनेटाइज़ करने के लिए अभी किनारे खड़े रहकर इंतजार करना पड़ेगा।

फिक्की फ्रेम्स 2016 में विज्ञापन की चुनौतियों पर आयोजित एक चर्चा सत्र में पिंग डिजिटल ब्रॉडकास्ट की सह-संस्थापक राजश्री नाइक ने कहा, “पारिस्थितिकी तंत्र में शामिल प्रकाशकों, ब्रॉडकास्टरों व विज्ञापनदाताओं/ ब्रांडों में से हर किसी को इस नई दुनिया का पैमाना उठाने के लिए एक साथ काम करना पड़ेगा। समझ की कमी बिजनेस को मार देगी।” सत्र का संचालन ग्रे वर्ल्डवाइड के चेयरमैन सुनील लुल्ला ने किया।

इस मीडिया की शैशवास्था को देखते हुए राजश्री का मानना है कि विज्ञापनदाताओं को किसी विज्ञापन को कितने ‘व्यूज़’ मिलते हैं, उसे ऑर्गेनिक या इनॉर्गेनिक के रूप में श्रेणीबद्ध नहीं करना चाहिए। वहीं, टैबूला के वाइस प्रेसिडेंट रैन बक का कहना था, “हमें इस हकीकत को स्वीकार कर लेना चाहिए कि ऑनलाइन बैनर ऐड काम नहीं करते हैं। इस सच से हमें आंखें नहीं चुरानी चाहिए।”

उद्योग के जानकारों की राय है कि ज्यादा से ज्यादा ब्रांडों को ऐसे विज्ञापन बनाने पर विचार करना होगा जो खासतौर पर डिजिटल माध्यम के लिए हों और लोगों का ध्यान खींच सकें। इस तरह का प्रयास डिटरजेंट ब्रांड एरियल ने नवीनतम विज्ञापन ‘शेयर द लोड’ में साफ झलकता है। याहू इंडिआ के वीपी व एमडी गुरमीत सिंह कहते हैं, “अलग-अलग दर्शकों के एक ही ब्रांड अभियान का लक्षित संदेश चलाना केवल डिजिटल दुनिया में भी मुमिकन है।”

साथ ही विज्ञापन के कंटेंट को उपभोक्ता बर्ताव की बदलती गत्यात्मकता को देखते हुए बराबर ज्यादा प्रासंगिक बनाते रहने होगा। ब्रांड ऐसे टूल का इस्तेमाल कर सकते हैं जो यूज़र के बर्ताव को ट्रैक करते हैं और उसे डेटा को अपनी बेहतर डिजिटल विज्ञापन रणनीति में उपयोग कर सकते हैं।

ज़ैप्र मीडिया लैब्स के सह-संस्थापक संदीपन मंडल का कहना था, “डिजिटल विज्ञापन को सभी फॉर्मैट पर ज्यादा बांधनेवाला बनाया जा सकता है। हमने एक ऑटो ब्रांड के लिए मोबाइल पर एक विज्ञापन अभियान चलाया जो उसके टेलिविजन कमर्शियल (टीवीसी) से जुड़ा था। लक्षित दर्शकों के आधार पर हमने अलग-अलग फॉर्मैट बनाए। जैसे, एक प्लेटफॉर्म पर केवल उत्पाद का खासियतें बताई, जबकि दूसरे प्लेटफॉर्म पर इससे अलग संदेश लेकर गए।”

भाषाई संप्रेषण एक और पहलू है जिस पर ब्रांडों को डिजिटल जगत में अपनी प्रासंगिकता निर्धारित करते वक्त गौर करना चाहिए। बक का कहना था, “देखा गया है कि जब कोई ब्रांड दर्शक की भाषा विशेष (उदाहरण के लिए जागरण की वेबसाइट पर अग्रेज़ी के बजाया हिंदी में विज्ञापन) में बात कहता है तो विज्ञापन का प्रदर्शन 40 प्रतिशत बेहतर रहता है।”

इस बीच डिजिटल कंटेंट सर्जक और प्रकाशक अभी भी मोनेटाइजेशन को लेकर हाथ-पैर मार रहे हैं, बजाय इसके कि कोई सीधा रास्ता पकड़ लें। विडूली के संस्थापक सुब्रत कार का कहना था, “डिजिटल पाठक या दर्शक अच्छे कंटेंट से चिपकते हैं। और, कुछ ब्रांड कंटेंट प्रोड्यूसरों के साथ बैठकर इस दर्शक आधार को पकड़ने में जुट जाते हैं। मसलन, उबर ने टीवीएफ (द वायरल फीवर) के साथ गठबंधन कर लिया।” इस गठबंधन के हिस्से के रूप में टीवीएफ के लिए साइन-अप करनेवाले हर दर्शक को उबर की दो यात्राएं मुफ्त में होती है जिसमें से हर यात्रा की असल कीमत 200 रुपए की है।

इधर ओवर-द-टॉप (ओटीटी) कंटेंट प्रकाशकों के लिए नए मैदान के रूप में उभर रहा है। लेकिन सेवाप्रदाता फ्रीमियम मॉडल को लागू कर सकें, यह सूरत अभी काफी दूर नज़र आती है। फ्रीमियम मॉडल में प्रीमियम कंटेंट की कीमत ली जाती है, जबकि बाकी सारा कंटेंट मुफ्त होता है।

पीओकेकेटी के संस्थापक व सीईओ रोहित शर्मा कहते हैं, “तब तक ओटीटी सेवा प्रदाता विज्ञापन आय पर निर्भर हैं। नए डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ाने के लिए सभी हितधारकों को इस कारकों पर विचार करना होगा।”