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‘टेलिविज़न दर्शकों का विखंडन दाम के साथ ही साथ पहुंच भी घटा देता है’

इस समय टीवी विज्ञापन जिन चुनौतियों से रूबरू है, उनमें से कुछ हैं – विखंडन, स्थानीय स्तर के बड़े समाधानों का न होना, लक्षित विज्ञापनों की सीमाएं और वीडियो ऑन डिमांड (वीओडी) का बढ़ना।

Vikram_Sakhuja_मैडिसन मीडिया में ओओएच के सीईओ विक्रम सखूजा का कहना है, “विज्ञापनदाता के नज़रिए से देखें तो वे अब भी टीवी पर काफी ज्यादा भरोसा कर सकते हैं। लेकिन अगर उन्हें दर्शक बनाना बहुत मुश्किल लगता है तो उन्हें डिजिटल पर गौर करना चाहिए। अगर लक्षित समूह सही है तो आप कह सकते हैं कि अगर टीवी इतनी बुरी तरह विखंडित है तो मैं डिजिटल की तरफ जा सकता हूं।”

टेलिविज़न पोस्ट के आश्विन पिंटों को दिए गए इंटरव्यू के पहले भाग में सखूजा ने टीवी विज्ञापन के परिदृश्य, विभिन्न जॉनरों पर बीएआरसी के डेटा के असर, गैर-क्रिकेट संपत्तियों के प्रदर्शन और विखंडन की चुनौतियों के बारे में बात की है। 

मैडिसन ने इस साल टीवी विज्ञापन से अपनी अपेक्षा को इतना ज्यादा क्यों घटा दिया है?

क्योंकि ई-कॉमर्स, फैशन, यात्रा और रियल एस्टेट जैसे कुछ क्षेत्रों ने तेज़ी नहीं दिखाई है। हम जितना सोचते थे, उन्होंने उससे कमतर प्रदर्शन किया है। टीवी पर प्रिंट समेक किसी भी अन्य श्रेणी की बनिस्बत ज्यादा असर पड़ा है। एफएमसीजी ने प्रिंट को काफी बढ़ने में समर्थ बनाया है। विज्ञापन देने में ई-कॉमर्स की सुस्ती टीवी पर प्रिंट की तुलना में कहीं ज्यादा है।

मैडिसन को उम्मीद है कि साल की दूसरी छमाही में भी पहली तिमाही की तरह 11 प्रतिशत वृद्धि होगी। लेकिन दिवाली और दशहरा की वजह से क्या दूसरी छमाही टीवी विज्ञापन के लिए बेहतर नहीं होगी?

दिवाली और दशहरा तो हर साल होते हैं। हम साल-दर-साल के विकास की बात कर रहे हैं। विभिन्न क्षेत्रों की स्थिति के मद्देनज़र हमारा मानना है कि दूसरी छमाही में पहली छमाही जैसा ही प्रदर्शन रहेगा। ई-कॉमर्स, ड्यूरेबल्स और ऑटो जैसे जो क्षेत्र इन त्योहारों में जोश भरते रहे हैं, वे इस बार उतना सक्रिय नहीं हैं जितना मैंने सोचा था कि वे रहेंगे।

क्या आप ई-कॉमर्स के प्रभाव के बारे में बताएंगे और क्या आपको लगता है कि इस साल अन्य श्रेणियां इसकी भरपाई कर सकती हैं?

ऐसा लगता है कि ई-कॉमर्स क्षेत्र इस साल विज्ञापन से ज्यादा जवाबदेही और प्राप्ति की मांग करने लगा है।

‘आज टीवी पर 3 प्रतिशत से कम कार्यक्रमों को 1 से ज्यादा की रेटिंग मिलती है। हो सकता है कि 7 प्रतिशत को 0.5 प्रतिशत से अधिक की रेटिंग मिल जाए। मतलब यह कि हर बार जब आप योजना बनाते हो तो आप पहुंच बनाने में जुट जाते हो।’

अब फ्री-टू-एयर (एफटीए) चैनल ज्यादा हो गए हैं तो अधिकतर जॉनरों के लिए फ्री कमर्शियल टाइम (एफसीटी) कम क्यों हो गया है?

एफटीए चैनल लंबे समय से रहे हैं। अब उन्हें ग्रामीण रेटिंग की वजह से तवज्जो दी जाने लगी है।

एफसीटी के लिहाज़ से गिरावट अंग्रेजी के आला चैनलों, कुछ क्षेत्रीय चैनलों, न्यूज़ (अंग्रेज़ी व हिंदी) और गैर-क्रिकेट खेलों में आई है।

बीएआरसी के डेटा के मुताबिक, हिंदी फिल्म चैनल, हिंदी के सामान्य मनोरंजन चैनलों (जीईसी) से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। मैं नहीं जानता कि यह रुझान कब तक बना रहेगा। लेकिन डेटा में यह साफ झलक रहा है।

मराठी जॉनर में आश्चर्यजनक रूप से रेटिंग थोड़ी गायब हो गई है। विज्ञापनदाता सोचने लगे है कि वे क्षेत्रीय मराठी चैनलों को लें या इस बहुत महत्वपूर्ण बाजार में हिंदी की तरफ छिटके हिस्से को पकड़ें।

अंग्रेज़ी मनोरंजन श्रेणी में और भी ज्यादा खिलाड़ी उतर रहे हैं। फिर, इस पर कैसे असर पड़ा है?

अंग्रेज़ी मनोरंजन को हुआ नुकसान कुछ हद तक डिजिटल वीडियो का फायदा बन गया है। यू-ट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म आ जाने से कुछ क्लाएंट अपने धन का थोड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी मनोरंजन से निकालकर वहां लगाने लगे हैं। अब वे बीएआरसी के आधार पर भी गौर कर रहे हैं तो देखते हैं कि क्या बदलाव आता है। मैं नहीं जानता कि इससे कोई असर पड़ेगा। लेकिन हाल-फिलहाल अंग्रेज़ी मनोरंजन की हालत अच्छी नहीं दिख रही।

फुटबॉल और कबड्डी जैसे अलग-अलग खेलों में स्थानीय लीग के साथ क्रिकेट से परे जाने का प्रयास हो रहा है। विज्ञापनदाताओं की इस पर क्या प्रतिक्रिया है?

यह एक अच्छा कदम है और इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कबड्डी एक अच्छा उदाहरण है। इसने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। एक बार जब खेल उभर के उठेगा तो इस क्षेत्र में प्रारंभिक प्रस्तावक का लाभ विज्ञापनदाताओं को लंबे समय तक मिलेगा।

इंडियन सुपर लीग (आईएसएल) थोड़ा संघर्ष कर रही है, लेकिन मुझे आशा है कि क्रिकेट से इतर खेलों का विकास जारी रहेगा। सिर्फ मार्कटिंग भूल जाइए, मुझे लगता है कि देश को इसकी ज़रुरत है। इसी तरह से बाकी खेल बढ़े तो मझे अच्छा लगेगा। क्रिकेट ने कुल मिलाकर बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है।

‘ब्रॉडकास्टरों को अन्य चमकते क्षेत्रों के साथ तरजीह देते हुए जुड़ने से पहले कई बार सोचना पड़ेगा क्योंकि इससे छोटे समय के लिए बड़े लाभ अर्जित किए जा सकते हैं, लेकिन ये चमक दिखाकर रातोंरात गायब भी हो सकते हैं।’

लेकिन क्रिकेट से इतर इन्वेंटरी क्यों कम हो गई है?

क्रिकेट से इतर इन्वेंटरी में कमी आई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खेल नहीं बढ़ा है। उदाहरण के लिए स्टार जैसी कंपनियों ने जो निवेश किया है चाहे वह आइएसएल हो या कबड्डी, बहुत सचेत रूप से किया है और सही दर नहीं मिलने पर वे इन्वेंटरी नहीं बेच रहे हैं और इससे वे परेशान भी नहीं हैं। तो एफसीटी खेल को परखने के लिए सबसे अच्छा मेट्रिक नहीं हो सकता। एफसीटी नीचे जाने का मतलब यह नहीं है कि परिणाम भी उतने ही ज्यादा नीचे चले गए हैं।

न्यूज़ जॉनर संघर्ष कर रहा है क्योंकि वहां कई प्लेयर हैं और इस कारण विज्ञापनदाता ऐसे परिदृश्य में राजा बन गए है?

हां। न्यूज़ जॉनर बहुत भीड़-भाड़ हो गई है।

इस साल अब तक टीवी विज्ञापन में कैसे रुझान देखे गए हैं?

एफएमसीजी टीवी विज्ञापन का आधार बना हुआ है। मैं इसके योगदान को 51 प्रतिशत तक नीचे जाने की उम्मीद कर रहा था क्योंकि बाकी कई अन्य श्रेणियों का खर्च बढ़ा रहा था। लेकिन इसमें 53 प्रतिशत तक यानी एक प्रतिशत का इजाफा हुआ है, जो कुल मिलाकर काफी महत्वपूर्ण है। एफएमसीजी प्रोडक्ट आप हर दिन खरीदते हैं। टूथपेस्ट, साबुन, शैम्पू का विज्ञापन खर्च दिवाली और दशहरा से प्रभावित नहीं होगा। तो इस उम्मीद का कोई कारण नहीं कि इस दीवाली और दशहरा पिछली बार की तुलना में और अधिक विकास हो सकता है।

ब्रॉडकास्टरों को अन्य चमकते क्षेत्रों के साथ तरजीह देते हुए जुड़ने से पहले कई बार सोचना पड़ेगा क्योंकि इससे छोटे समय के लिए बड़े लाभ अर्जित किए जा सकते हैं, लेकिन ये चमक दिखाकर रातोंरात गायब भी हो सकते हैं।

‘बीएआरसी के डेटा के मुताबिक, हिंदी फिल्म चैनल, हिंदी के सामान्य मनोरंजन चैनलों (जीईसी) से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। मैं नहीं जानता कि यह रुझान कब तक बना रहेगा। लेकिन डेटा में यह साफ झलक रहा है।’

टीवी विज्ञापन आय का विभाजन कैसे होता है?

करीब एक तिहाई हिस्सा हिंदी जीईसी और हिंदी फिल्मों से आता है। क्षेत्रीय सेगमेंट को एक साथ रखे तो वहां से एक तिहाई आता है। खेल से 13 प्रतिशत आता है।

टीवी विज्ञापन के सामने प्रमुख चुनौतियों क्या हैं?

विखंडन, स्थानीय स्तर पर पैमाना बढ़ाने के सोल्यूशन का अभाव, सीमाओं को लक्षित करना और वीडियो-ऑन डिमांड (वीओडी) का बढ़ना – ये कुछ चुनौतियां, यह क्षेत्र झेल रहा है।

विखंडन की चुनौती पर क्या आप और बता सकते हैं?

आज टीवी पर 3 प्रतिशत से कम कार्यक्रमों को 1 से ज्यादा रेटिंग मिलती है। हो सकता है कि 7 प्रतिशत को 0.5 प्रतिशत से अधिक की रेटिंग मिल जाए। मतलब यह कि हर बार जब आप योजना बनाते हो तो आप पहुंच बनाने में जुट जाते हो।

धीमी गति से पहुंच बन पा रही है क्योंकि अधिक से अधिक चैनल आ रहे हैं और लोग और अधिक चैनलों व कार्यक्रमों के बीच विभाजित होते जा रहे हैं। यह विखंडन का कारण बनता है। आपको वैसी पहुंच देने के लिए एक बहुत अच्छे अनुकूलक की ज़रुरत है। अगर पहले मुझे 1+ के साछ 120 जीआरपी (ग्रॉस रेटिंग प्वाइंट) पाकर 60 प्रतिशत तक की पहुंच मिलती थी, तो अब मुझे उसी पहुंच को पाने के लिए 150 या 180 जीआरपी की ज़रुरत है। यह समस्या है।

विज्ञापनदाता के दृष्टिकोण से, वे अभी भी टीवी में बहुत विश्वास करते हैं, लेकिन अगर वे दर्शकों की संख्या का निर्माण करने में बहुत मुश्किल पाते हैं तो उन्हें तकनीक उन्मुख प्लेटफॉर्म जैसे डिजिटल की ओर जाना होगा। डिजिटल पर यूट्यूब और फेसबुक जैसी तकनीक का उपयोग करना और इससे कम अंतराल में पहुंच बनाना संभव है। उतनी ही पहुंच हासिल करने के लिए आवश्यक जीआरपी की संख्या वास्तव में कम हो जाती है। उस बिंदु पर, यदि लक्षित ग्रुप सही है, तो आप कहेंगे कि अगर टीवी इतनी बुरी तरह से खंडित है, तो मैं डिजिटल पर जा सकता हूं। इससे टीवी को नुकसान होगा।

विखंडन कीमतों को नीचे ले आता है और साथ ही यह पहुंच भी कम कर देता है। यहां तक कि अगर सीपीआरपी (प्रति रेटिंग पोइंट की लागत) एक ग्राहक के लिए कम हो जाती है, तब भी मैं एक बिंदु से आगे वांछित पहुंच नहीं हासिल कर सकता, और सीपीआरपी का अपने आप में कम मूल्य है।