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आईबीएफ ने ब्रॉडकास्ट व कंटेंट वितरण को इंफ्रास्ट्रक्चर मानने की वकालत की

मुंबई: वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ नई दिल्ली में 26 नवंबर को बजट-पूर्व चर्चा में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) और अन्य हितधारकों ने दलील दी है कि ब्रॉडकास्टिंग व कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन क्षेत्र को ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ का दर्जा दे दिया जाना चाहिए।

मीडिया से बात करते हुए आईबीएफ के अध्यक्ष पुनीत गोयनका ने कहा, “मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि आईबीएफ ने वित्त मंत्री व अन्य प्रमुख अधिकारियों के साथ ब्रॉडकास्टिंग क्षेत्र से जुड़े कुछ अहम मुद्दों – नीति संबंधी और टैक्स संबंधी, दोनों ही तरह के मुद्दों पर अच्छी चर्चा की है। ब्रॉडकास्टिंग व कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन क्षेत्र को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा देना चर्चा के दौरान रखी गई हमारी एक प्रमुख मांग थी।

इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा मिल जाने पर ब्रॉडकास्टरों व डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्मों को देश में डिजिटलीकरण को पूरा करने के मिशन के बेहद पूंजी-सघन दौर में बेहतर व सस्ती फाइनेंसिंग का सुविधा मिल जाएगी।”

आईबीएफ के महासचिव गिरीश श्रीवास्तव का कहना था, “ब्रॉडकास्टिंग व कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन क्षेत्र देश के लिए टेलिकॉम जैसा ही महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर है। डिजिटल टेलिविज़न सिग्नल देने के अलावा इसे ब्रॉडबैंड सेवाएं देने में प्रभावी तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे सरकार की ई-गवर्नेंस पहल को मदद मिलेगी। डिजिटलीकरण के जरिए एड्रेसेबिलिटी लागू हो जाने पर ब्रॉडकास्ट सेवाओं से सरकारी खजाने में जीएसटी व अन्य टैक्सों के रूप में काफी सारा राजस्व आ सकता है क्योंकि डिजिटल कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन सेवाओं में तब पारदर्शिता आ चुकी होगी।”

टैक्स के मोर्चे पर उठाई मुख्य चिंता ब्रॉडकास्टिंग क्षेत्र में समामेलन या विलय की स्थिति में आयकर अधिनियम की धारा 72ए के तहत घाटे को आगे ले जाने के लाभ से संबंधित थीं। इस समय यह सुविधा टेलिकॉम, सॉफ्टवेयर व आईएसपी सेवाओं को मिली हुई है। साथ ही बैठक के दौरान भारतीय कंपनी में हिस्सेदारी वाली विदेशी कंपनी का दूसरी विदेशी कंपनी में विलय होने पर शेयरधारकों की करदेयता, रिटर्न की प्रोसेसिंग की बाहरी सीमा को कम करने के प्रावधान, न्यूनतम वैकल्पिक टैक्स (मैट) की दर घटाने, दोहरे कराधान संधि समझौतों के बरक्श ट्रांसपोंडर किराए पर लेने से जुड़े विदहोल्डिंग टैक्स जैसे लंबित मुददों पर चर्चा हुई जिनके चलते ब्रॉडकास्टिंग, डीटीएच व हिट्स सेवाओं वगैरह में लगी कंपनियों को सालाना 2 से 2.2 करोड़ डॉलर का अनावश्यक बोझ उठाना पड़ रहा है।

ज़ी नेटवर्क के प्रेसिडेंट ए. मोहन ने बताया, “टैक्स और विनियमन के मोर्चे पर हमारी प्रमुख मांगों में इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा, 72ए के लाभ, मैट को तर्कसंगत बनाना, ट्रांसपोंडर की रॉयल्टी और टीडीएस को युक्तिसंगत बनाना जैसी बातें शामिल हैं। इनका वास्ता सरकार से जुड़ी नीतियों व प्रक्रियाओं, दोनों से है। इन्हें पूरा करना देश में बिजनेस करने की आसानी की दिशा में पहल का अच्छा उदाहरण बन जाएगा।”

उन्होंने यह भी कहा, “टेलिविज़न अब हर किसी के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। यह आवश्यक सेवाओं की स्थिति में पहुंच गया है क्योंकि यह जनता तक सूचना व मनोरंजन पहुंचने का अहम जरिया है। इसे देखते हुए ब्रॉडकास्टिंग व डिस्ट्रीब्यूशन सेवाओं पर जीएसटी की दर कम रखी जानी चाहिए क्योंकि आवश्यक सेवा के रूप में इसे जनता को सहज सुलभ होना चाहिए।”

भारतीय कंपनी में हिस्सेदारी वाली विदेशी कंपनी का दूसरी विदेशी कंपनी में विलय होने के मामले में शेयरधारकों की करदेयता के मसले पर स्टार इंडिया के सीएफओ, संजय जैन का कहना था, “सरकार को आयकर कानून के प्रावधानों में संशोधन करके साफ करना चाहिए कि इसी तरह की छूट उच्च प्राथमिकता पर शेयरधारकों को भी उपलब्ध है। अगर विलय की जानेवाली कंपनी के शेयरधारकों को करदेयता में समान छूट नहीं दी जाती तो विदेशी कंपनियों के विलय की इजाजत देने का मकसद ही अधूरा रह जाएगा।”