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भारत में बच्चों के कंटेंट पर अंकुश के लिए कानून चाहिए

मुंबई: भारत की एक तिहाई आबादी बच्चों की है। इसके मद्देनज़र देश में ऐसा कानून बनाने की जरूरत है जो इस लक्षित आय समूह के दर्शकों को दिखाई जानेवाली प्रोग्रामिंग की निगरानी और नियमन कर सके। इस कानून में माता-पिता की तरफ से की जानेवाली निगरानी के भी दिशानिर्देश उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

कानून को विदेशी और भारतीय सामग्री के बीच सही संतुलन बनाने पर गौर करना चाहिए। ब्रॉडकास्टरों और बच्चों का कंटेंट बनानेवालों के लिए भी ज़रूरी है कि वे ऐसी प्रोग्रामिंग बनाएं जो शिक्षा व मनोरंजन के संतुलन को बनाए रखे।

फिक्की फ्रेम्स 2016 सम्मेलन के दूसरे दिन एक सत्र को संबोधित करते हुए विशेषज्ञों ने कहा है कि ब्रॉडकास्टरों व कंटेंट सर्जकों के लिए बेहत महत्वपूर्ण है कि वे ऐसा कंटेंट विकसित करें जो बच्चों की ज़िदगी में मूल्य जोड़े और शिक्षा व मनोरंजन में संतुलन बनाए।

Subhash_Ghaiफिल्मकार सुभाष घई ने अफसोस जताया कि हम अन्य देशों की नकल करते हैं। हमारी फिल्मों और टीवी शोज़ की अवधारणाएं बच्चों के जॉनर तक में उधार ली गई हैं क्योंकि कंटेंट सर्जक भारतीय संस्कृति से अच्छी तरह वाकिफ नहीं हैं। आज भी हमारे बच्चे पश्चिम से प्रभावित हैं।

धई ने कहा, “एक कानून लाने की ज़रूरत है। हमें अपनी संस्कृति के बारे में नहीं सिखाया गया है। हमारे पास इतना सारा कंटेंट है कि उन्हें वेदों की तरह उपयोग किया जा सकता है।”

उन्होंने कहा कि रचनात्मक समुदाय का उपयोग करते हुए उच्च गुणवत्ता का स्थानीय कंटेंट बनाना बहुत जरूरी है। इसके लिए प्रोड्यूसर को जोखिम लेना पड़ेगा।

गियर एजुकेशन के संस्थापक श्रीनिवासन ने कहा कि रचनात्मकता का मूल्य है, लेकिन मुद्दा यह है कि क्या बच्चों का कंटेंट इसे निकालता है। क्या बच्चों के शो नवाचार के दौर में कहीं टिक पाते हैं? उनका कहना था, “मुझे नहीं मालूम। माता-पिता अक्सर सोचते हैं कि टीवी एक बेबीसिटर है। अगर ऐसा है तो विनियमन को सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे स्तरीय कंटेंट देखें। माता-पिता के लिए दिशानिर्देश होने चाहिए। माहौल ही बच्चे के चरित्र का निर्माण करता है।”

श्रीनिवासन ने बच्चों के बेहतर स्थानीय कंटेंट के महत्व पर ज़ोर दिआ। उन्होंने कहा, “अगर बच्चे हमारी संस्कृति के बारे में नहीं जानते तो उनके पास क्या होगा? बच्चे का चरित्र उसके दस साल का होने से पहले बन जाता है।”

चर्चा में सामने आया कि बच्चों के लिए पर्याप्त काम नहीं किया जा रहा है जो अपने-आप में शर्म की बात है क्योंकि बच्चे ही तो हमारा भविष्य हैं। भारतीय संस्कृति के बुनियादी मूल्य कहानी और बहादुरी के कारनामों के ज़रिए बताने की जरूरत है। ‘छोटा भीम’ ने असर दिखाया है क्योंकि अभिभावक अपने बच्चों को इसे देखने देते हैं। यह भारतीय संस्कृति और परंपरा को सिखाता है।

छोटा भीम के निर्माता राजीव चिलाका ने कहा कि देश में 16 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या 63 करोड़ है, जबकि रेटिंग एजेंसी बीएआरसी इनमें से कुछ की ही गणना करती है। इसके अलावा बहुत सारे बच्चे दूरदराज के इलाकों में हैं। डीडी किड्स के रूप में समर्पित चैनल आ जाए तो इसके ज़रिए ग्रामीण इलाकों के तमाम बच्चों तक पहुंचा जा सकता है क्योंकि वहां तक केबल टीवी की पहुंच नहीं हो सकती।

आजकल माता पिता के पास कल्पनाशील तरीके से कहानियों सुनाने का समय नहीं होता। इसलिए टीवी शोज़ को यह ज़रूरत पूरी करनी पड़ती है।

सीएफएसआई के अध्यक्ष मुकेश खन्ना ने उल्लेख किया है कि अगर कोई देश के नागरिकों के मन को सुधारना चाहता है तो उसे बच्चों को लक्षित करना पड़ेगा। उनका कहना था, “बच्चों का कंटेंट गैर-भारतीय है। कोई नहीं अंकुश रखता कि क्या दिखाया जा रहा है। महाभारत में बदलाव कर दिए जाते हैं और कोई भी सवाल नहीं उठाता। क्यों ऐसा है? हमें किसी तरह के विनियमन की जरूरत है।”

खन्ना ने कहा कि प्रोड्यूसरों द्वारा बच्चों को ऐसा कंटेंट देना चाहिए जो शिक्षित भी करें और मनोरंजक भी हो। उन्होंने कहा कि एक्ट से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि बच्चों के लिए एक निश्चित मात्रा में स्थानीय कंटेंट मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि बच्चे कभी कभी वयस्कों के शो भी देखते हैं और उससे जीवन के बारे में उन्हें पता चलता है।

सत्र में यह भी चर्चा की गई कि भारतीय शो को अच्छी टीआरपी मिल जाती है। भारतीय कंटेंट काम करता है। बच्चे हमारी जड़ों से जुड़े रहें और अच्छी गुणवत्ता का स्थानीय कंटेंट उनके सामने पेश करना बहुत ज़रूरी है।

Nina-Elavia-Jaipuria-EVP-GM-Nickelodeon-Sonic-India-5-150x150वायकॉम18 की वीपी और सोनिक व निकलोडियन इंडिया की जीएम नीना जयपुरिया ने उल्लेख किया कि आज निक के पास 65 प्रतिशत स्थानीय कंटेंट है। पर एक एक दशक पहले ऐसा नहीं था। हालांकि, अधिक काम किया जाना चाहिए। उसने कहा कि स्थानीय किरदार, ज़िम्मेदारी से बनाए गए हैं और सामाजिक संदेश देते हैं।

उन्होंने कहा, “यह एक आंदोलन है और डिजिटलीकरण ने इसमें भूमिका निभाई है। बच्चे जो चाहते हैं हमें उन्हें वही देना चाहिए। मांग के साथ आपूर्ति भी बढ़नी चाहिए।”

जयपुरिया ने कहा कि स्थानीय कंटेंट बनाना आसान नहीं रहा। लाइव एक्शन की तुलना में स्थानीय एनीमेशन छह गुना अधिक महंगा होता है। इसलिए सरकार को आगे आकर रियायतें और टैक्स में छूट देनी चाहिए।

निक गेम्स, लाइसेंसिंग और मर्केडाइजिंग सौदों के माध्यम से स्थानीय आईपी का एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाता है और विदेशों में किरदारों को ले जाता है।

उन्होंने अभिभावकों की भूमिका पर ज़ोर देते हुए कहा कि यह माता पिता पर निर्भर है कि वे बच्चों की गतिविधियों पर लक्ष्मण रेखा खींचे। वे ही तय करते हैं कि बच्चों का समय होमवर्क करने, टीवी देखने, कितना समय बाहर खेलने में और कितना समय एप्प पर खर्च हो।

सत्र में, यह मुद्दा भी उठा कि अगर प्रोड्यूसर आईपी अपने पास बनाए रख पाए तो बच्चों के कंटेंट की गुणवत्ता में नाटकीय सुधार होगा। इससे समान अवसर मिलेंगे और एक्ट में इसकी गुंजाइश हो सकती है। अन्य देशों के साथ सह-निर्माण के सौदों में कई मुद्दे हैं। एक मुद्दा है कि भारत टैक्स क्रेडिट देना नहीं चाहता। शायद जीएसटी के कार्यान्वयन से समस्या को हल करने में मदद मिल सकती है।

सिनेमाघरों में भी बच्चों की स्थानीय फिल्मों की स्क्रीनिंग के मामले में उदासीनता है। उदाहरण के लिए, ‘दिल्ली सफारी’ ने चीन और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में अच्छा प्रदर्शन किया। भारत में, हालांकि, यह नहीं दिखाई गई। यहां तक कि डीडी ने भी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

इसे प्रमोट करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। हालांकि जयपुरिया ने निक पर 65 प्रतिशत स्थानीय कंटेंट की ओर इशारा किया। घई ने इस तरह की कंटेंट की उत्कृष्टता पर सवाल उठाते हुए कहा कि बच्चे आईपैड का उपयोग विदेशी कंटेंट देखने के लिए करते हैं।