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आगरा देश में डैस के सबसे वाहियात बाज़ारों में से एक है। वित्त वर्ष 2013-14 में सी टीवी की आय का 82% हिस्सा रिसीवेबल्स में था। शहर में कार्यरत सभी एमएसओ के लिए एलसीओ से समय पर रकम जुटाना बहुत दुरूह है। हैथवे ने वहां डैस को अनिवार्य बनाने के बाद जून 2013 में कदम रखा।

पटना के बाज़ार की खासियत यह है कि सरकार ने जब तक केबल टीवी के डिजिटलीकरण का अपना कार्यक्रम घोषित नहीं किया, तब तक वहा कोई राष्ट्रीय एमएसओ था ही नहीं। सिटी केबल ने संयुक्त उद्यम बनाया और जीटीपीएल का प्रवेश हुआ। टेलिविज़न पोस्ट की रिसर्च में है पटना का पूरा तानाबाना।

पुणे के बाज़ार में 8,53,463 सब्सक्राइबरों के साथ डीटीएच का हिस्सा 61.9% है। एक स्वस्थ लक्षण यह है कि पुणे का बाज़ार अधिक एआरपीयू के मॉडल पर टिका हुआ है। यह बात इस तथ्य से साफ होती है कि प्रीमियम डीटीएच ब्रांड माने जानेवाले टाटा स्काई के पास वहां सबसे ज्यादा सब्सक्राइबर हैं। टेलिविज़न पोस्ट की रिसर्च में और भी बहुत कुछ खास।

इंदौर में शुद्ध ग्राहक एआरपीयू 170 रुपए महीना है, जबकि केबल ऑपरेटर द्वारा एकत्र की जा रही सालाना सब्सक्रिप्शन आय 62 करोड़ रुपए और ब्रॉडकास्टरों द्वारा दी जा रही कैरेज़ फीस 20 करोड़ रुपए है। टेलिविज़न पोस्ट ने अपनी रिसर्च में इदौर के बाज़ार में एमएसओ और एलसीओ के रंगढंग की भी कायदे से पड़ताल की है।

सोलापुर में केबल वालों ने कुल 1.10 लाख सेट-टॉप बॉक्स लगा रखे हैं। डीचीएच ऑपरेटरों का हिस्सा डैस के तंत्र में मात्र 24.13% है। टेलिविज़न पोस्ट ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में वहां की प्रति यूज़र औसत आय, बाज़ार के आकार और एमएसओ व एलसीओ के बिजनेस मॉडल जैसे तमाम पहलुओं पर गौर किया है।

इनवेंटरी की कमी की भरपाई के लिए हिंदी के मनोरंजन चैनलों को विज्ञापन की दर 15-25% बढ़ानी पड़ेगी। ब्रॉडकास्टरों को हर साल विज्ञापन की दरें बढानी पड़ सकती हैं। विज्ञापनदाताओं को ज्यादा दाम देने को तैयार करना बहुत कठिन होगा, खासकर तब, जब चैनल के दर्शक घट रहे हों। टेलिविज़न पोस्ट की विशेष रिसर्च में 12 मिनट विज्ञापन की सीमा के असर की पड़ताल…

एमएसओ की लाभप्रदता कैरेज़ फीस पर टिकी है। एक्टीवेशन आय से बढ़ता है सकल लाभ और पहुंच बढ़ती है सेट टॉप बॉक्सों से। टेलिविज़नपोस्ट की रिसर्च बताती है कि ब्रॉ़डकास्टरों को कैरेज़ में 30 प्रतिशत कमी के बीच पे टीवी आय में उछाल की उम्मीद है।