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नोटबंदी के बीच बढ़ रहा है विज्ञापन को रोकने, टालने या घटाने का डर

मुंबई: सरकार के नोटबंदी के फैसले के तहत 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को खत्म किए जाने और उपभोक्ता खर्च में गिरावट आने के माहौल में तमाम विज्ञापनदाता यह तय करने में जुट गए हैं कि स्थिति सामान्य होने तक विज्ञापन खर्च को जारी रखा जाए, रोक दिया जाए या कम कर दिया जाए।

Vikram_Sakhuja_मैडिसन कम्युनिकेशंस ग्रुप में मीडिया व ओओएच (आउट ऑफ होम) विज्ञापन के सीईओ विक्रम सखूजा के मुताबिक, उपभोक्ता मांग घट गई है और विज्ञापनदाताओं का एक अंश खर्च की समीक्षा करना चाहता है। उनका कहना है, “नवंबर पर असर पड़ा है। हमें देखना है कि दिसंबर कैसा जाता है। बड़ी अस्थिर स्थिति है जिसमें देखना और इंतज़ार करना ही रणनीति है। ब्रॉडकास्टरों के साथ मिलकर राह निकाली जा रही है।”

सखूजा के लिए खास मसला यह है कि यह स्थिति कितनी लंबी खिंचती है। उन्होंने कहा, “नया कुछ करने की योजना बना रहे कुछ विज्ञापनदाताओं को तय करना होगा कि उसे आगे बढ़ाएं या स्थगित कर दें। कुछ तो कटौती तक पर विचार कर रहे हैं।”

हालांकि उन्होंने इसके साथ की कहा कि विमुद्रीकरण एक अच्छी चीज़ है। ज़मीन स्तर पर इसे समर्थन हासिल है।

रोहित गुप्ता

सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (एसपीएनआई) के प्रेसिडेंट रोहित गुप्ता ने कहा कि अनिश्चितता की वजह से कुछ क्लाएंट विज्ञापन रद्द करना चाहते थे लेकिन कंपनी इसके लिए राजी नहीं थी। हालांकि, वो इसे स्थगित करने के लिए तैयार थी। उन्होंने कहा, “यह एक अल्पकालिक स्थिति है। एक क्लाएंट ने अपना विज्ञापन एक हफ्ते टाल दिया,  जो कोई बड़ी बात नहीं है। स्थिति जल्द ही फिर से सामान्य हो जाएगी। इसके अलावा, टीवी विज्ञापनदाता के लिए महज़ बिक्री के बिंदु से आगे भी बहुत कुछ है। इससे उसका ब्रांड बनता है।”

वही, ज़ी यूनिमीडिया के सीईओ आशीष सहगल ने बताया कि नवंबर में टीवी क्षेत्र पर असर नहीं पड़ा क्योंकि महीने के रिलीज़ ऑर्डर पहले ही आ चुके थे। उनकी कंपनी ने इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) के निर्देश का पालन किया जिसमें एजेंसियों व क्लाएंटों से मौजूदा अनुबंधों का सम्मान करने को कहा गया है।

ashishसहगल का कहना है, “हम आईबीएफ की सलाह के हिसाब से चले। वे मीडिया माध्यम जिनके पास मासिक रिलीज़ ऑर्डर नहीं थे, उन पर इस महीने असर पड़ा होगा। हां, सर्दियों के लिए अभियान चलानेवाली कंपनियों ने प्रतिक्रिया दिखाई है। मसलन, 50 प्रतिशत एफएमसीजी कंपनियों ने ऐसा किया है।”

उनके लिए आनेवाले दिन महत्वपूर्ण हैं क्योंकि विज्ञापनदाता स्थिति को जांच-परख रहे हैं। वे कहते हैं, “अगर उपभोक्ता का मन वापस लौटता है तो विज्ञापनदाता के वापस न लौटने की कोई वजह नहीं है। लेकिन अगर उपभोक्ता की मनोदशा नहीं सुधरती तो असर पड़ सकता है। विज्ञापनदाता सर्दियों की सक्रियता टाल सकते हैं। वे दिसंबर के लिए योजना बना रहे हैं, लेकिन हालात को समझने तक उन्होंने अपनी योजनाएं रोक रखी हैं। हाल-फिलहाल हम नहीं जानते कि चीजें क्या रुख लेंगी, लेकिन विज्ञापनदाताओं को मेरी सलाह है कि उन्हें खर्च करना चाहिए। अगर वे ज्यादा खर्च और विज्ञापन करते हैं तो उससे खपत बढ़ेगी।”

सहगल ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “अगर आप मुश्किल वक्त में खपत को सुधारना चाहते हैं तो खर्च में कटौती कोई समाधान नहीं है। कैश की उपलब्धता हर दिन सुधर रही है। अंततः लोगों ने अपना धन तो गंवाया नहीं है। फर्क बस इतना पड़ा है कि वो अब बैंक में है। कैश के अलावा भी खपत के अन्य साधन हैं। पेटीएम के साथ 8 लाख वेंडर नए आ गए हैं। अगर डिजिटल के ज़रिए ज्यादा खपत होती है तो समग्र खपत रोज़ाना बढ़ सकती है।”

वे मानते हैं कि अच्छी बात यह है कि नोटबींद दिवाली के बाद हुई है। उनका कहना था, “यह अच्छी बात थी। नवंबर अमूमन सुस्त महीना होता है। सभी ब्रॉडकास्टरों ने अक्टूबर में वाकई अच्छा धंधा किया है।”

सहगल यह भी सोचते हैं कि बीएफएसआई (बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं व बीमा) जैसै श्रेणियां अब ज्यादा सक्रिय हो जाएंगी क्योंकि बैंकों के पास अतिरिक्त धन आ गया है। बैंक अब ज्यादा विज्ञापन करेंगे क्योंकि उन्हें ज्यादा ऋण बांटने हैं। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अब पेटीएम और पेयू की तरह ज्यादा सक्रिय हो सकते हैं जिससे ऑनलाइन सौदे बढ़ सकते हैं।

Shashi-Sinhaआईपीजी मीडियाब्रांड्स के सीईओ शशि सिन्हा ने कहा कि नोटबंदी की वजह से कुछ श्रेणियां खर्च बढ़ाने को प्रेरित होंगी, जबकि दूसरे अगले 30-40 दिनों तक अपनी सांस रोके रहेंगे। उनका कहना है, “यह एक दर्शकों की नहीं, बल्कि श्रेणी की बात है। इसमें श्रेणी के आधार पर फर्क पड़ेगा।”

उन्होंने बताया कि कुछ क्लाएंटों ने 10-15 दिनों के लिए विज्ञापन हटा लिए हैं। लेकिन उनका कहना था, “यह एक अल्पकालिक दौर है। वे छह महीने के लिए विज्ञापन नहीं हटा रहे। लोग कह रहे हैं कि वे चार-पांच हफ्तॆ तक इंतजार करेंगे और देखेंगे। कोई भी लंबी अवधि के नजरिए से बाहर नहीं निकला है।”