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सीआईडी: कहानी भारत के सबसे सफल जासूसी धारावाहिक की

मुंबई: कुछ तो गड़बड़ है – बार-बार यह कहनेवाले एसीपी प्रद्युमन पिछले 17 वर्षों से शत-प्रतिशत अपराधिक मामलों को सुलझाने वाले सबसे सफल पुलिस अफसरों में से एक हैं। मज़बूत इरादों वाले समर्पित और ईमानदार ‘सीआईडी’ के इंस्पेक्टर जानते हैं कि जब शातिर अपराधियों को पकड़ने की बारी आती है तो वो बच्चों का खेल नहीं है। दया दरवाजा तोड़कर खोलता है तो अभिजीत अपने सहयोगियों के साथ इस मामले को हल करने के लिए अपनी विश्लेषण क्षमता का उपयोग करता है। अंत में अपराधी सीआईडी ​​द्वारा घेर लिया जाता है और फिर एक थप्पड़ की आवाज़ आती है! और निर्देशक चिल्लाता है कट!

टेलिविज़न पर सबसे लंबे समय तक चलने वाली जासूसी सीरीज़ में से एक ‘सीआईडी​​’ के खाते में कई बातें पहली बार है। यह टीवी पर पहला फिक्शन पर आधारित पुलिस-जासूसी शो है; यह सबसे लंबे समय तक चलने वाला शो (17 साल) है और अब भी चल रहा है और इसने 111 मिनट के सबसे लंबे समय का एक शॉट देकर गिनीज बुक में विश्व रिकॉर्ड दर्ज किया है।

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जब मैं सीआईडी ​​ब्यूरो और फॉरेंसिक लैब के रूप में प्रसिद्ध सेट के आसपास घूम रही थी, तब ये तथ्य मुझे इस शो और उसके रचयिता के प्रति अभिभूत करने के लिए पर्याप्त थे। टीम अगले शॉट की तैयारी में जुटी हुई थी और मुझे लगा जैसे कैंडी की दुकान में खड़ी मैं एक बच्ची हूं क्योंकि मैं उन लाखों लोगों में से एक हूं जो सोनी एंटरटेनमेंट टेलिविज़न पर यह शो देख कर बड़े हुए हैं।

एक सफल फ्रेंचाइज़ी बनाने का सारा श्रेय ‘सीआईडी’ के जनक बृजेन्द्र पाल सिंह को जाता है जो अपने साथी प्रदीप उप्पुर के साथ फायरवर्क्स प्रोडक्शंस चलाते हैं। एक बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक, सिंह ने इस शो के विभिन्न एपिसोड के लिए कई रोल बतौर लेखक, अभिनेता, निर्देशक और कैमरामैन अदा किए हैं।

इस शो की चल रही गिरफ्तार सीरीज के लिए लिख रहे बृजेन्द्र पाल सिंह से मैंने उनके लेखन सत्र के बीच-बीच में बातचीत की क्योंकि उनके पास समय की कमी थी। सिंह ने मुझे बताया, “एक साल पहले तक मैं लेखन के अलावा डायलॉग की प्रत्येक लाइन को सही किया करता था, अभी मैं लगातार स्क्रिप्ट का संपादन कर रहा हूं। ”

शो एक सप्ताह में फिर से तीन बार प्रसारित हो रहा है और लगातार नए और प्रयोगात्मक एपिसोड बनाते हुए शो को ताज़ा बनाए रखने के लिए टीम पर दबाव अब दोगुना हो गया है।

कहा जाता है कि परिवर्तन ही स्थाई है और इस शो के संदर्भ में यही सही है। निर्माता बराबर नए विचार लाते रहते हैं ताकि विभिन्न आयु वर्ग में अपने निष्ठावान दर्शकों को वे इस शो के आदी बनाए रखें।

DSC_0071पिछले कुछ वर्षों में ‘सीआईडी​​’ में कई परिवर्तन आए जिसमें से एक शो की पैकेजिंग है। परदे पर और परदे के पीछे टीम का विस्तार भी शामिल है। कहानियों के संदर्भ में भी ध्यान अपराध का पता लगाने से हटकर एक्शन पर डाला गया है और कुछ एपिसोड लोकप्रिय एसीपी प्रद्युमन, अभिजीत और दया को केंद्र में लेकर बनाए गए हैं।

थोड़ा और विस्तार से बताते हुए  इंस्पेक्टर अभिजीत की भूमिका निभाने वाले आदित्य श्रीवास्तव ने कहा,  “अब अपनी-अपनी शैली में शुटिंग करने वाले 4-5 निर्देशक हैं। इससे पहले  हम अपराध का पता लगाने पर ज़्यादा, एक्शन पर कम ध्यान केंद्रित करते थे। हम सिर्फ अपराध के मामलों को सुलझाने वाले पुलिस थे लेकिन जैसे-जैसे पात्र स्थापित और लोकप्रिय हो गए हमने उनके आसपास कहानियां बुननी शुरू कर दी। यहां तक ​​कि प्रस्तुति के संदर्भ में भी  हम और अधिक आधुनिक हो गए हैं।”

प्रयोगों की बात करें तो कुछ दर्शकों को यह रोमांचक सीरीज़ प्रद्युमन की नाटकीयता, फ्रेडरिक के चुटकुले और दया के स्टंट की वजह से एक कॉमेडी ज़्यादा लगती है। टीम द्वारा किए गए ये प्रयोगों के बाद उन्हें पता चला कि इससे बच्चे शो के साथ जुड़ रहे हैं।

सीआईडी ​​के बारे में मजेदार तथ्य:

  • सीआईडी ​​की टीम ने इस शो की शूटिंग के लिए पूरे देश भर में और फ्रांस, स्विटजरलैंड और लंदन की यात्रा की है।
  • शिवाजी साटम बहुत अच्छी लस्सी बनाते हैं और मूड में होने पर सेट पर मौजूद हर किसी के लिए वे लस्सी बनाते हैं।
  • आदित्य श्रीवास्तव ने सीआईडी​​ में एक खलनायक के रूप में शुरूआत की थी और फिर ‘आहट’ में अभिनय किया। उसके बाद बी पी सिंह ने उसे एक पुलिस वाले की भूमिका की पेशकश की।
  • श्रीवास्तव शुरू में केवल 26 एपिसोड शूट करने के लिए सहमत हुए थे। लेकिन शो ने उन्हें ऐसा बांधा कि पिछले 17 साल से वे शो के साथ बने हुए हैं।
  • टीम के लिए सबसे यादगार एपिसोड वह रहा जो गिनीज बुक में बतौर विश्व रिकार्ड दर्ज हुआ।
  • भारत तिब्बत सीमा के पास शूटिंग किए गए एक एपिसोड में शिवाजी साटम बर्फ में डूब गए थे और समय रहते टीम के तीन सदस्यों ने उन्हें बाहर निकाल कर बचा लिया था।

 
बिग बॉस शिवाजी साटम  उर्फ एसीपी प्रद्युमन  खुद बताते हैं, “जब हमने देखा कि शो को बच्चे देख रहे हैं तो हम इसे और अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए हास्य ले आए और यह बाजार के परीक्षण की तरह था। हम लगातार अभिनव प्रयोग करते रहते हैं। हमारा नया प्रोमो अधिक एक्शन उन्मुख है। जितना आप ब्रांड निर्माण करते हो और एक ब्रांड बन जाते हो उतने अधिक आप सफल हो जाते हो।”

DSC_0084दरअसल एसीपी प्रद्युमन खुद एक ब्रांड बन गए हैं शो में अपने अस्वाभाविक व्यवहार के कारण कई चुटकुले भी उन पर बन गए हैं। उन्होंने कहा कि कई स्टैंड अप हास्य कलाकार उनके इस हाव-भाव का उपयोग करते हैं। लेकिन क्या यह उनको प्रभावित करता है?

झट से जवाब देते हुए उन्होंने कहा, “लोगों द्वारा ‘सीआईडी​​’ और मेरे चरित्र पर बनाए गए चुटकुलो का मैं भी आनंद उठाता हूं। ऐर इससे यह साबित होता है कि आप और आपका चरित्र और अधिक लोकप्रिय होते जा रहे हैं।”

 

एसीपी के 3 सबसे लोकप्रिय चुटकुले:

  • दुनिया को एसीपी प्रद्युमन की नज़रों से देखो पुरी दुनिया गड़बड़ दिखेगी।
  • थ्री इडियट्स में सीआईडी: बहती हवा सा था वो, उड़ती पतंग सा था वो … एसीपी: ‘दया! कहां गया, उसको ढूढों।’
  • सीआईडी ​​देखने का अलग ही एहसास है … सीआईडी ​​देखने का अलग ही एहसास है… दया, कातिल यहीं कहीं आसपास है

साटम कहते हैं, “फिक्शन में आप असली के साथ और अधिक कुछ जोड़ते हैं। यदि यह ज़्यादा हो जाए तो यह एक कार्टून या हेमिंग बन सकता है। मुझे एक निश्चित छवि अभिनीत करनी है और अपने आपको उसी तरह दिखाना भी है।”

जब शो शुरू किया गया था तब बी पी सिंह ने साटम के चरित्र के बारे में एक निश्चित ढ़ंग से सोचा था।
तो, कैसे यह अपराध जासूसी सीरीज़ इतना बड़ा ब्रांड बन गई? शायद इसकी कहानी बहुतों को पता हो पर टेलिविज़न पोस्ट यादों के गलियारों में जाकर इस सीरीज़ के प्रारंभिक वर्ष और उसकी वृद्धि को पुनर्जीवित कर रहा है।

साल 1973 में दूरदर्शन में बतौर एक न्यूज़ कैमरामैन काम करते हुए बी.पी. सिंह ने कई पुलिस अधिकारियों के साथ बातचीत की थी और अपराध की कहानियां और उनकी जांच-पड़ताल के बारे में जाना था। डीडी के लिए ‘सिर्फ चार दिन’ नामक हत्या के रहस्य वाली टीवी फिल्म बनाते समय ज़्यादा जानकारी के लिए उन्होंने क्राइम ब्रांच का दौरा किया था। इससे उनकी रुचि इस विषय पर बढ़ी और उन्होंने एक मराठी जासूसी सीरीज़ ‘एक शून्य शून्य’ बना डाली। शिवाजी साटम ने पुलिस इंसपेक्टर की भूमिका इस शो में निभाई थी।

DSC_0113सिंह कहते हैं, “मेरे पास क्राइम ब्रांच की फ़ाइलों का एक ढ़ेर था। जब इस तरह का कार्यक्रम पहली बार बनाया गया तो काफी चर्चा में रहा। लेकिन असली अपराध की कहानियों पर कार्यक्रम बनाने में ड्रामा और रहस्य का अभाव होता है। मैं तो एक रहस्य कथाकार हूं इसलिए मैंने ‘सीआईडी​​’ बनाने के बारे में सोचा।”

शो के जिस एक प्रमुख बिंदु पर सिंह ने विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया है वह फोरेंसिक विशेषज्ञता है। सायन अस्पताल में एक चिकित्सक को वे जानते थे जो फोरेंसिक विशेषज्ञ था। उन्होंने कहा, “विज्ञान में एक शरीर के बारे में आश्चर्यजनक तथ्य हैं जो फोरेंसिक विज्ञान से लोगों के बीच लाए जा सकते हैं यह मैने जब शुरूआत की तब मैं जानता था। मैं जानता था कि लोग इससे विस्मित होंगे। इसलिए मैंने डॉ. सालुंके का चरित्र गढ़ा और वह तुरंत हिट भी हो गया।”

इंटरनेट की अनुपस्थिति में सिंह ने किताबों से इस विषय के बारे में जानकारी हासिल की।

वे कहते हैं, “उस समय केवल एक ही चैनल (ज़ी टीवी) हुआ करता था और इस प्रकार के टीवी कार्यक्रम के बारे में कोई मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं था। मुझे इसकी अवधारणा पसंद थी तो मैंने बिना किसी फंडिंग के इस शो को बनाने के बारे में सोचा और बना डाला।”

लेकिन पहला एपिसोड प्रसारित होने के तुरंत बाद यह नंबर वन पर पहुंच गया और सिंह की दूसरी सीरीज़ ‘आहट’ से आगे चला गया। फिर अंत में हॉरर शो की जगह आत्मविश्वास  से भरपूर टीम ने ‘सीआईडी​​’  के प्रयोग शुरू कर दिए। फिर ‘आहट’ के लेखक श्रीधर को लाया गया और सिंह व श्रीधर ने मिलकर इसकी स्क्रीप्ट लिखी।

जब प्रतिक्रिया आनी शुरू हुई तब निर्माता सतर्क हो गए। पहली बड़ी प्रतिक्रिया यह मिली कि बच्चे शो देख रहे थे।

वह कहते हैं, “यह बहुत ही आश्चर्य की बात थी। हम दिमाग को छकाने वाली रहस्यमय सीरीज़ बना रहे थे और बच्चे इसका आनंद ले रहे थे।”

बच्चों में सीआईडी ​​टीम के किरदार देखकर आकांक्षा जगी कि उन्हें बड़े होकर ऐसा ही बनना है। एसीपी प्रद्युमन एक निरस चरित्र था लेकिन लोगों को उसकी ईमानदारी और निष्ठा के कारण उसमें आशा दिखी। अभिजीत एक महान विश्लेषणात्मक दिमाग और दया ताकत का प्रतीक बना।

DSC_0100दया की भूमिका निभाने वाले दयानंद शेट्टी का मानना है कि बच्चों को आपराधिकों को एक थप्पड़ मारा जाना बेहद पसंद आया।

प्रत्येक चरित्र शो में एक सख्त पुलिस वाले की भूमिका निभाते हैं पर जब  कैमरे बंद हो जाते हैं तो उन्हें देखना मज़ेदार होता है क्योंकि वे उनके रोल के विपरीत मज़ाकिया और  दोस्ताना हो जाते हैं।

शेट्टी कहते हैं, “हम परदे पर बहुत गंभीर हैं पर हम परदे के पीछे गंभीर नहीं रह सकते। अन्यथा यह एक मुर्दाघर की तरह हो जाएगा। इसलिए हम प्रफुल्लित रहने की कोशिश करते हैं और सेट पर मज़ा व उल्लास बना रहता है।”

हालांकि हाल ही में टीम पर दबाव ज़्यादा बढ़ गया है। प्रोडक्शन खर्च बढ़ने से निवेश भी ज़्यादा करना पड़ता है और कभी-कभी नुकसान भी हो जाता है।

इस शो की तुलना  पहले ‘करमचंद’  से होती थी और अब ‘सावधान इंडिया’ और ‘क्राइम पैट्रोल’ के साथ लोग इस शो की तुलना करते हैं। पर सिंह का दावा है कि प्रत्येक शो की स्टाइल और जॉनर में बहुत फर्क है।

DSC_00611उनका मानना है कि ‘सीआईडी​​’ किसी धारावाहिक से कहीं अधिक एक पारिवारिक श्रृंखला है।
एक महिने में सभी 30 दिन सुबह 9 बजे से शुरू होकर रात 10 बजे तक शूटिंग करनी पड़ती है जिससे टीम बहुत ज़्यादा व्यस्त हो गई है। छह निर्देशकों और लगभग 300 लोगों की टीम के बावजूद शेड्युल बहुत कसा हुआ रहता है।

आज इस विशेष दिन भी टीम के 100 सदस्यों के साथ तीन इकाइयां एक साथ एपिसोड को पूरा करने के लिए बाहर और स्टूडियो में शूटिंग कर रही है। और मैंने दया को देखा वह एक तरफ बाहर की और स्टूडियो की शूटिंग कर रहा है तो दूसरी तरफ ‘सिंघम 2’ के लिए शूटिंग करने खारगर भाग रहा है।

इसके अलावा फिलहाल  चल रही ‘गिरफ्तार’ सीरीज से साजिश और अधिक पेचीदा हो गई है। यह वीरता पुरस्कार के साथ चैनल और टीम द्वारा किए गए कई अभिनव प्रयोग का एक हिस्सा भर है।

निर्देशक और बी.पी. सिंह के पुत्र सलिल सिंह कहते है, “दर्शक हर दृश्य को कहानी के अगले कदम के रूप में देखते हैं। इसलिए हमें हर दृश्य को हर संभव तरीके से दिलचस्प बनाना पड़ता है। ‘गिरफ्तार’ सीरीज में ज़्यादा एक्शन, नाटक और दर्शकों के लिए मनोरंजक दृश्य होंगे।”

डीसीपी चित्रोले बने बी पी सिंह और एसीपी प्रद्युमन के बीच फिल्माए गए ड्रामा और दिलचस्प दृश्यों को देखकर तथा खतरे में पड़े दया के जीवन वाली गिरफ्तार सीरीज ने निश्चित रूप से मुझे सम्मोहित कर दिया है।