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भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों को अलग नियामक ढांचे के तहत लाया जाना चाहिए: ट्राई

मुंबई: भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) केबल ऑपरेटरों को लोकल चैनल उपलब्ध करानेवाले भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों को एक अलग नियामक ढांचे के अंतर्गत लाना चाहता है।

ट्राई ने डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटरों (डीपीओ) और भू-आधारित या ग्राउंड-बेस्ट ब्रॉडकास्टरों द्वारा चलाए जा रहे प्लेटफॉर्म सेवा चैनलों में अंतर करते हुए सिफारिश की है कि सूचना व प्रसारण मंत्रालय को उनके लिए रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क बनाना चाहिए।

ट्राई ने कहा है, “यह फ्रेमवर्क जिस हद तक भू-आधारित ब्रॉडकास्ट मॉडल पर लागू होगा, वहां तक पारंपरिक सैटेलाइट-आधारित ब्रॉडकास्टरों के लिए सूचना व प्रसारण मंत्रालय के अपलिंकिंग/डाउनलिंकिंग दिशानिर्देशों में निहित फ्रेमवर्क जैसा ही होगा। इसलिए इस पर स्पेक्ट्रम इस्तेमाल के लिए अंतरिक्ष विभाग और डब्ल्यूपीसी (वायरलेस प्लानिंग एंड को-ऑर्डिनेशन) की स्वीकृति/मंजूरी की शर्त लागू नहीं होगी।

भू-आधारित ब्रॉडकास्टर कौन हैं?

भू-आधारित ब्रॉडकास्टर न तो सैटेलाइट-आधारित ब्रॉडकास्टर हैं और न ही डीपीओ द्वारा चलाए जा रहे प्लेटफॉर्म सेवाओं के चैनल। वे अपना कंटेंट केबल नेटवर्क के हेडएंड को टेरेस्ट्रियल रूप से ट्रांसमिट करते हैं। ऐसे चैनलों की कोई अपलिंकिंग या डाउनलिंकिंग नहीं होती।

भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों की पहुंच किसी डीपीओ द्वारा चलाए जा रहे लोकल चैनलों से ज्यादा व्यापक होती है क्योंकि उनको एक से ज्यादा केबल नेटवर्क पर वितरण का फायदा मिल सकता है। लेकिन वे सैटेलाइट-आधारित चैनलों की पहुंच की बराबरी नहीं कर सकते।

हालांकि वे प्रोग्राम कंटेंट के जॉनर और विज्ञापन दिखाने के मामले में पारंपरिक सैटेलाइट-आधारित चैनलों के समान होते हैं। विज्ञापन की आय चैनल के मालिक को मिलती है। नतीतजन, इन भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों के पास दिखाए जा रहे कंटेंट के सारे राइट्स होते हैं और वे ही उसके लिए जिम्मेदार होते हैं।

भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों के लिए अलग नियामक ढांचे का जरूरत क्यों?

चूंकि भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों के लिए कोई नियामक ढांचा नहीं है। इसलिए वे अपने चैनलों को सूचना व प्रसारण मंत्रालय के पास पंजीकृत नहीं करा सकते। इस तरह वैधानिक रूप से उन्हें ‘ब्रॉडकास्टर’ की मान्यता भी नहीं मिली हुई है।

ट्राई का कहना है कि प्लेटफॉर्म सेवाओं से जुड़े मुद्दों पर विचार करते हुए साफ हो गया कि ऐसे भू-आधारित चैनलों के ब्रॉडकास्टरों को भी प्रस्तावित रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क में लाना होगा।  इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि सभी तरह के ब्रॉडकास्टर और भारत में किसी भी टेलिविजन नेटवर्क पर उपलब्ध उनके चैनल सूचना व प्रसारण मंत्रालय में पंजीकृत होंगे।

उसने जिक्र किया कि, “सलाह-मशविरे की प्रक्रिया के दौरान भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों ने खुद मांग की थी कि उन्हें उपयुक्त नियामक ढांचे के ज़रिए वैधानिकता प्रदान की जाए।”

प्राधिकरण के संज्ञान में यह बात अलग से आई कि सैटेलाइट-आधारित ब्रॉडकास्टर के पास लाइसेंस-युक्त कंटेंट होता है जिसे राष्ट्रीय एमएसओ के नेटवर्क के ज़रिए टेरेस्ट्रियल रूप से उसके सैटेलाइट-आधारित चैनल पर दिखाया जाता है।

ट्राई ने कहा है, “राष्ट्रीय एमएसओ होने के नाते भू-आधारित चैनलों के दर्शकों की संख्या सैटेलाइट-आधारित चैनल जितनी ही बड़ी होती है। ऐसा होने की बड़ी वजह टेरेस्ट्रियल नेटवर्क पर वितरण की कम लागत हो सकती है।  ऐसे मामले दिखाते हैं कि सभी भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों और भू-आधारित चैनलों को एक तुलनीय नियामक ढांचे के तहत लाने की ज़रूरत है।”

उसका यह भी कहना है कि टेरेस्ट्रियल ऑप्टिकल-फाइबर नेटवर्क की बढ़ती पहुंच के चलते इन चैनलों के पास सैटेलाइट ब्रॉडकास्ट जैसी ही दर्शक संख्या पाने की सामर्थ्य है और कभी-कभी वे इसे काफी कम लागत में हासिल करसकते हैं।

ट्राई से साफ किया है, “अगर ज्यादा भिन्न लागत के साथ भू-आधारित ब्रॉडकास्टिंग का नियामक ढांचा अस्पष्ट रहता है तो इसका अनुचित फायदा ब्रॉडकास्टर उठा सकते हैं और उससे उन्हें टेरेस्ट्रियल रास्ता अपनाने का प्रोत्साहन मिलेगा। पीएस के लिए चली विचार-विमर्श की प्रक्रिया में हितधारकों ने भू-आधारित ब्रॉडकास्टिंग को लेकर व्यापक राय रखी थी। इसके मद्देनज़र प्राधिकरण ने स्वयं तय किया कि इस मसले पर सिफारिशें पेश की जाएं ताकि सभी मुद्दों को समग्र रूप से कवर किया जा सके।”

ट्राई ने कैसे नियामक ढांचे की सिफारिश की

भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों की छोटी पहुंच को देखते हुए राज्य को एक इकाई माना जाना चाहिए और 15 या इससे अधिक राज्यों तक पहुंच को अखिल भारतीय उपस्थिति माना जाना चाहिए।

ट्राई ने अपनी साफ करते हुए कहा है, “इस तथ्य को देखते हुए कि भारत की 90 प्रतिशत आबादी सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले 15 राज्यों में रहती है, भारत के 15 राज्यों में भू-आधारित ब्रॉडकास्टर की मौजूदगी को अखिल भारतीय उपस्थिति माना जा सकता है।

ट्राई का कहना है कि जो राज्य पूर्वोत्तर परिषद (एनईसी) के सदस्य हैं, उन्हें एक राज्य के समतुल्य माना जा सकता है।

ट्राई के मुताबिक, अखिल भारतीय स्तर पर भू-आधारित ब्रॉडकास्टर पारंपरिक सैटेलाइट-आधारित ब्रॉडकास्टर जैसा ही दायित्व अपनाएंगे। छोटे स्तर की मौजूदगी को, वैसे हर राज्य में जहां उस चैनल का वितरण हो रहा है, उसका दायित्व आनुपातिक रूप से पारंपरिक सैटेलाइट-आधारित ब्रॉडकास्टर के दायित्व का 7 प्रतिशत रहेगा। आनुपातिक कमी नेटवर्क की आवश्यका, अनुमति और सालाना फीस पर लागू होगी।

ट्राई ने यह भी सिफारिश की है कि डीपीओ के साथ ऊर्ध्ववत एकीकृत भू-आधारित ब्रॉडकास्टर पर वे सभी बंदिशें लागू होंगी जो नियामक संस्था ने 23 जुलाई 2014 को जारी ‘नए डीटीएच लाइसेंस संबंधी मुद्दों पर सिफारिशें’ शीर्षक के तहत ऊर्ध्ववत एकीकृत एककों पर लगाई हैं।

नियामक ढांचा

पीएस और भू-आधारित टीवी चैनलों के मुख्य अंतर के बारे में ट्राई ने कहा है कि पीएस चैनल के मामले में कंटेंट के ब्रॉडकास्ट के वैधानिक राइट्स, उसकी ज़िम्मेदारी और उससे हासिल विज्ञापन आय उस डीपीओ की होगी जिसके नेटवर्क पर पीएस चैनल को पेश किया जा रहा है।

उसका कहना है, “वहीं भू-आधारित चैनल के मामले में, भले ही वह उसी डीपीओ के नेटवर्क पर ट्रांसमिट किया जा रहा हो, कंटेंट की जिम्मदारी और उससे हासिल विज्ञापन आय चैनल के मालिक, यानी भू-आधारित ब्रॉडकास्टर की होगी, न कि डीपीओ की।”

इसके अलावा ट्राई की सिफारिशों के मुताबिक, जहां पीएस चैनल डीपीओ के अपने सब्सक्राइबरों को ही वितरित किए जा सकते हैं, वहीं भू-आधारित ब्रॉडकास्टर, किसी पारंपरिक सैटेलाइट-आधारित ब्रॉडकास्टर की तरह किसी एक टीवी डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तक सीमित नहीं है। इसके प्रोग्राम/चैनल एक साथ विभिन्न डीपीओ को आगे री-ट्रांसमिशन के लिए ब्रॉडकास्ट/टांसमिट किए जा सकते हैं।

नियमन के संदर्भ में कहा गाय है कि पारंपरिक सैटेलाइट और भू-आधारित ब्रॉडकास्टरों के लिए ढांचा एक ही होना चाहिए। बस यह मामला छोड़कर कि स्पेक्ट्रम के उपयोग जैसी अंतरिक्ष विभाग और डब्ल्यूपीसी विंग की की स्वीकृति/मंजूरी की ज़रूरत इनके साथ नहीं होगी।