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एलएमओ ने ट्राई से लोकल केबल चैनलों पर बंदिश न लगाने का आग्रह किया

मुंबई: डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटरों (डीपीओ) द्वारा दी जा रही प्लेटफॉर्म सेवाओं के लिए यकीनन एक मजबूत रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क की ज़रूरत है, लेकिन इनमें दिए जानेवाले कंटेंट के प्रकार और लॉन्च की जानेवाली प्लेटफॉर्म सेवाओं की संख्या पर कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए। यही आम राय थी, हाल ही में प्लेटफॉर्म सेवाओं पर मुंबई में आयोजित खुली चर्चा में शिरकत करनेवालों की।

इस खुली चर्चा का आयोजन भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) द्वारा किया गया था। इसमें हिस्सा लेनेवालों में ज्यादातर अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचनेवाले लास्ट-माइल ऑपरेटर (एलएमओ) थे। लेकिन इसमें मल्टी-सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ), डायरेक्ट-टू-होम (डीटीएच) ऑपरेटरों व डिस्ट्रीब्यूरों के प्रतिनिधि और केबल चैनल मालिक भी मौजूद थे।

Tइस चर्चा में ट्राई की तरफ से उसके सदस्य आर के आर्नोल्ड, प्रमुख सलाहकार एन परमेश्वरन, कानूनी सलाहकार अमित मोहन गोवित, कर्नाटक व केरल के क्षेत्रीय प्रमुख सिबिचेन के. मैथ्यू और सलाहकार सुनील कुमार सिंघल ने हिस्सा लिया।

यूं तो ज्यादातर प्रतिभागियों ने ट्राई के परामर्श-पत्र में दी गई प्लेटफॉर्म सेवाओं (पीएस) की परिभाषा को सही माना। लेकिन कुछ का कहना था कि इस परिभाषा में थोड़ी फेरबदल की ज़रूरत है।

रिलायंस डिजिटल टीवी में कंटेंट की ईवीपी नेहा दमानिया ने कहा कि पीएस की परिभाषा में इंटरैक्टिव, पे-पर-व्यू और ऑन-डिमांड सेवाओं के साथ ही भविष्य में डीपीओ द्वारा दी जा सकनेवाली किसी अन्य सेवा को भी कवर किया जाना चाहिए।

ट्राई के मुताबिक, “प्लेटफॉर्म सेवाएं (पीएस) डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटरों (डीपीओ) द्वारा केवल अपने सब्सक्राइबरों के लिए प्रसारित कार्यक्रम हैं और इसमें दूरदर्शन के चैनल और डाउनलिंकिंग दिशानिर्देशों के तहत अनुमति प्राप्त टीवी चैनल शामिल नहीं हैं।”

N-Parameswaran-150x150पीएस पर दिखाए जा सकनेवाले कंटेंट के प्रकार के बारे में लगभग सर्वसम्मति थी कि पीएस परक किस तरह के कार्यक्रम दिखा जा सकते हैं, इस पर कोई भी बंदिश नहीं होनी चाहिए।

नियामक संस्था ने अपने परामर्श पत्र में प्रस्ताव रखा है कि पीएस चैनल न्यूज़ और/या करेंट अफेयर्स के प्रोग्राम, किसी भी तरह की राजनीतिक घटना की कवरेज़, अपलिंकिंग/ डाउनलिंकिंग दिशानिर्देशों के तहत स्वीकृत किसी भी दूरदर्शन चैनल या टीवी चैनल द्वारा प्रसारित किया जा रहा/ किया गया प्रोग्राम नहीं दिखा
सकते। इसमें सीरियल, रियलिटी शो और आईपीएल, रंजी ट्रॉफी आदि जैसे अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व राज्य स्तर के स्पोर्ट्स टूर्नामेंट भी शामिल हैं।

ravi-subbaiah-150x150एनएमटीवी के प्रधान संपादक डॉ. रवि सुब्बैया ने कहा कि पीएस पर न्यूज़ व करेंट अफेयर्स की इजाज़त दी जानी चाहिए क्योंकि स्थानीय केबल समाचार चैनल मौसम, आपदा, जनहित से जुड़ी प्रशासन की चेतावनी, यातायात और कानून-व्यवस्था जैसे स्थानीय रूप से प्रासंगिक मुद्दों पर समाचार व अद्यतन जानकारी लाकर स्थानीय लोगों के लिए जीवन रेखा का काम करते हैं।

सुब्बैया का कहना था कि स्थानीय केबल चैनल स्थानीय अखबार जैसे होते हैं। इसलिए उन्हें बिना किसी बंदिश के खुलकर काम करने की छूट मिलनी चाहिए।

mdनोवेक्स कम्युनिकेशंस के संस्थापक-प्रवर्तक केतन कनकिया ने कहा कि अगर पीएस चैनलों को किसी दूरदर्शन चैनल या टीवी चैनल पर प्रसारित किए जा चुके किसी कार्यक्रम को टांसमिट करने की इजाज़त नहीं दी गई तो इससे कंटेंट के राइट्स रखनेवालों को नुकसान होगा।

उन्होंने कहा कि कंटेंट के प्रोड्यूसर विभिन्न प्लेटफॉर्मों के लिए राइट्स बेचते हैं और राइट्स हमेशा के लिए नहीं बेचे जाते। इसलिए उस कंटेंट को प्रसारित करने पर कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए जो दूरदर्शन या किसी अन्य टीवी चैनल पर दिखाया जा चुका है।

रिलायंस डिजिटल टीवी की दमानिया ने कहा कि पीएस चैनलों पर क्या दिखाने की छूट होनी चाहिए, यह बताने के बजाय नियामक संस्था को सीधे-सीधे उन कार्यक्रमों की लिस्ट दे देनी चाहिए जिन्हें दिखाने की अनुमति नहीं है।

वॉल्ट डिज्नी कंपनी इंडिया के सलाहकार नितेश श्रीवास्तव ने अपने संगठन की राय रखते हुए कहा कि विभिन्न प्लेटफॉर्मों से आ रहे कंटेंट पर बंदिश लगाना सृजनात्मकता और नवोन्मेष को हतोत्साहित करना है।

इसके बाद चर्चा मुड़कर पीएस चैनलों की वैधानिक स्थिति, उनमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा और नेटवर्थ के मानंदड पर चली गई। इन मसलों पर आय राय यही थी कि केबल चैनलों का स्तर बहुत छोटा है। इसलिए इस सेगमेंट के लिए एफडीआई और नेटवर्थ के मानदंड ले आना अभी बड़ा अधकचरा कदम होगा।

atul-saraf-150x150पीएस चैनल नियमित टीवी ब्रॉडकास्टरों के दायरे में घुसपैठ तो नहीं कर रहे हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए कितने अंतराल पर समीक्षा की जानी चाहिए? इस मसले पर एबीएस एंटरटेनमेंट के मालिक अतुल सराफ ने कहा कि केबल चैनल तब से है, जब सैटेलाइट चैनलों का कोई वजूद ही नहीं था। इसलिए ब्रॉडकास्टरों के दायरे में उनके घुसने का सवाल ही नहीं उठता।

उन्होंने यह भी दलील दी कि किसी नए दिशानिर्देश की जरूरत नहीं है क्योंकि केबल चैनलों को पहले से ही केबल टेलिविज़न नेटवर्क अधिनियम 1995 की कार्यक्रम व विज्ञापन संहिता का पालन करना होता है।

पीएस चैनलों पर क्या वही सुरक्षा मंजूरियां/ शर्तें लगाई जानी चाहिए? इस सवाल पर एलएमओ के नुमाइंदों का कहना था कि केबल टीवी अधिनियम में प्रावधान हैं जो नियमों के उल्लंघन पर केबल ऑपेरटरों के खिलाफ अधिकारियों को कार्रवाई करने की इजाज़त देते हैं। इसलिए चल रहे पीएस चैनलों के लिए सुरक्षा मंजूरी के मानदंड की कोई ज़रूरत नहीं है।

एलएमओ ने यह बात भी बड़े मुखर तरीके से रखी कि पीएस चैनलों पर भौगोलिक इलाके की कोई सीमा नहीं लगाई जानी चाहिए क्योंकि बहुत सारे एमएसओ विभिन्न राज्यों को एक ही हेडएंड से सिग्नल मुहैया कराते हैं।

भौगोलिक रूप से सटे हुए इलाकों में काम कर रहे छोटे व स्वतंत्र एमएसओ पर भौगोलिक सीमाएं बांधना उन्हें अतिरिक्त सेवाएं उपलब्ध कराने से हतोत्साहित कर सकता है।

एनएमटीवी के सुब्बैया ने कहा कि केबल चैनलों की भौगोलिक सीमाएं बांधने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि फाइबर ऑप्टिक के ज़रिए ट्रांसमिट किए जा रहे उनके सिग्नल खुद ही लॉक्ड रहते हैं।

arvind-prabhoo-150x150इसके साथ ही महाराष्ट्र केबल ऑपरेटर्स फाउंडेशन (एमसीओएफ) के अध्यक्ष अरविंद प्रभू का कहना था कि डीपीओ द्वारा चलाए जानेवाले पीएस चैनलों की संख्या की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए क्योंकि डिजिटलीकरण के बाद डीपीओ द्वारा अपने सब्सक्राइबरों के लिए ज्यादा चैनल व सेवाएं लॉन्च करने के लिए पर्याप्त बैंडविड्थ हो गई है।

ब्रॉडकास्टरों को मिली मंजूरी के नियमों व शर्तों के उल्लंघन पर जिस तरह दंड दिया जाता है, क्या वैसे ही दंडात्मक प्रावधान पीएस पर भी लगाने की जरूरत है, इस मसले पर एलएमओ का कहना था कि उनकी निगरानी पहले ही स्थानीय प्रशासन द्वारा की जा रही है।

एक एलएमओ ने कहा कि केबल ऑपरेटरों को ब्रॉडकास्टरों द्वारा दिखाए गए आपत्तिजनक कंटेंट तक के लिए पुलिस की मार झेलनी पड़ती है।

उत्तर प्रदेश केबल ऑपरेटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल उपाध्याय ने लखनऊ का उदाहरण दिया, जहां एक केबल न्यूज़ चैनल द्वारा दूसरे समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक खबर प्रसारित करने पर सामुदायिक झड़पों की नौबत आ गई।

इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने सभी केबल चैनलों को कुछ दिन तक बंद करने का आदेश दे दिया। उपाध्याय का कहना था कि इससे साफ है कि केबल चैनलों पर भलीभांति अंकुश लगाने की व्यवस्था है और दंडात्मक प्रावधान की कोई ज़रूरत नहीं है।

उन्होंने ट्राई से आग्रह किया कि वह समूचे भारत में केबल चैनलों के लिए समान दिशानिर्देश तैयार करे क्योंकि अभी अलग-अलग राज्यों ने केबल चैनलों के लिए अपने अलग नियम बना रखे हैं।

टाइम्स टेलिविज़न नेटवर्क में कानूनी मामलों की जीएम व कंपनी सचिव ज्योति सुरेश कुमार का कहना था कि अभी ब्रॉडकास्टरों पर कठोर दंडात्मक प्रावधान लगाए गए हैं, जबकि लोकल केबल चैनलों को इस हकीकत के बावजूद पूरी छूट मिली हुई है कि उनकी गैर-जिम्मेदाराना हरकतों से कानून व व्यवस्था पर भारी असर पड़ सकता है।

उन्होंने सुझाव दिया कि ट्राई को दंडात्मक प्रावधान करने चाहिए, हालांकि इन्हें टीवी ब्रॉडकास्टरों जितना कठोर नहीं होना चाहिए।