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हितधारकों ने ट्राई को प्रारूप मॉडल और मानक इंटरकनेक्ट समझौते में संशोधन के कई सुझाव दिए

मुंबई: मल्टी-सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ), स्थानीय केबल ऑपरेटरों (एलसीओ) और ब्रॉडकास्टरों ने भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) को इंटरकनेक्शन समझौते के प्रारूप मॉडल व मानक स्वरूप में कुछ संशोधनों का सुझाव दिया है।

इंटरकनेक्शन अनुबंध की समाप्ति की समयावधि, टीवी सिग्नलों की चोरी और एलसीओ द्वारा किसी अन्य डिस्ट्रीब्यूटर से सिग्नल लेने के बारे में  हितधारकों के अलग-अलग विचार हैं।

अनुबंध की समाप्ति

शुरुआत ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (एआईडीसीएफ) के सुझाव से। उसने नियामक संस्था से कहा है कि उसे प्रस्तावित प्रारूप के क्लॉज़ 3.1 में संशोधन करना चाहिए और अनुबंध खत्म करने के लिए दोनों पक्षों को 51 दिन का समय दिया जाना चाहिए। इसमें से 30 दिन समझौते के उल्लंघन को सुलझाने के लिए होने चाहिए। अगर, इस दौरान मसला न सुलझे तो कोई भी पक्ष 30 दिन की समाप्ति के बाद 21 दिन में अनुबंध खत्म करने की नोटिस भेज सकता है।

वहीं, इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) का तर्क है कि 30 दिन समाधान के लिए देने के बाद कनेक्शन काटने के लिए 21 दिन की नोटिस देना रेग्युलेशन की भावना के खिलाफ है और 30 दिन का समय घटाकर 14 दिन कर दिया जाना चाहिए।

एआईडीसीएफ का सुझाव है कि अनुबंध की समाप्ति के बाद संपत्तियों को सौंपने का काम सब्सक्राइबर द्वारा चुनी गई स्कीम के अधीन होना चाहिए क्योंकि ट्राई के कायदों में तमाम स्कीमें हैं जिनके जरिए उपभोक्ता को हार्डवेयर व एसटीबी दिए जा सकते हैं। इसलिए सारा कुछ उपभोक्ता द्वारा चुनी गई स्कीम पर निर्भर करता है।

हैथवे केबल एंड डेटाकॉम ने सुझाव दिया है कि अनुबंध की समाप्ति के बाद संपत्तियों की लौटाने में विफल रहे दोषी पक्ष से भारतीय स्टेट बैंक की आधार दर, 9 प्रतिशत के ऊपर 4 प्रतिशत यानी 13 प्रतिशत का साधारण ब्याज लिया जाना चाहिए।

टीवी सिग्नल की चोरी

आईबीएफ ने प्रारूप समझौते के क्लॉज़ या खण्ड 8.7 को फिर से इस तरह लिखा जाना चाहिए जिससे सिग्नल की चोरी की जवाबदेही एमएसओ व एलसीओ पर डाल दी जाए क्योंकि ब्रॉडकास्टर कंटेंट उपलब्ध कराते हैं और सिग्नल चोरी की स्थिति में उन्हें ही नुकसान होना है।

सेवा के प्रावधान पर एआईडीसीएफ का सुझाव है कि, “एमएसओ गैर-विशेष रूप से एलसीओ को टीवी चैनलों के सिग्नल उपलब्ध कराएगा ताकि इलाके के सब्सक्राइबरों को उसी फॉर्मैट व तरीके से चैनल मिल सकें। उन्हें इस समझौता, तय मानकों, नीतियों, लागू कानून व नियम, कायदों, निर्देशों व संबंधित अधिकारियों के आदेशों का पालन करना होगा।”

डेन नेटवर्क्स ने सुझाव दिया है कि ट्राई उस क्लॉज़ 6.2 में संशोधन करे जिसमें कहा गया है कि एमएसओ को सिग्नलों को री-ट्रांसमिट करने के लिए ब्रॉडकास्टरों के साथ समझौते पर दस्तखत करने होंगे।

एमएसओ का कहना है कि बहुत सारी स्थितियां होती हैं जब ब्रॉडकास्टर और एमएसओ वार्ता के स्तर पर होते हैं और ब्रॉडकास्टर से सेवाएं एक एक लिखित ज्ञापन (एमओयू) के माध्यम से ली जा रही होती हैं।

डेन का कहना है कि प्रारूप समझौते में ऐसी बंदिश लगा देने से एमएसओ पर बिना प्रभाव का विश्लेषण किए हडबड़ी में सौदे पर दस्तखत करने का दबाव बनेगा और ब्रॉडकास्टरों को एमएसओ से अनुचित शर्तों पर अपनी बात मनवाने का मौका मिल जाएगा।

बिल कितने समय में

एआईडीसीएफ का सुझाव है कि एमएसओ को बिलिंग चक्र की समाप्ति के सात दिन के भीतर बिल तैयार करके भेज देना चाहिए क्योंकि सब्सक्राइबर मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) में डेटा डालने के लिए तीन दिन का समय बेहद कम है।

फेडरेशन का कहना है कि संपूर्ण सिग्नल के एनक्रिप्शन और जब तक वो एलसीओ के नेटवर्क तक नहीं पहुंच जाता, तब तक अपने नेटवर्क के ज़रिए उसे ट्रांसमिट करने की ज़िम्मेदारी एमएसओ की होगी।

लेकिन उसके बाद यह एलसीओ की ज़िम्मेदारी होगी कि वो सब्सक्राइबर के परिसर में लगाए गए एसटीबी तक ठीक से पहुंच जाए।

उपभोक्ता बिल तैयार करने के बारे में फेडरेशन का कहना है कि एमएसओ हर महीने की अंतिम दिन सब्सक्राइबर को दिए जानेवाले बिल / इनवॉयस बना देंगे। एलसीओ इनका प्रिंटआउट निकालकर संबंधित सब्सक्राइबरों को बिल/इनवॉयस की तारीख के सातवें दिन या सात दिन के भीतर दे देगा।

एलसीओ इनवॉयस की तारीख के 15वें दिन या उससे पहले सब्सक्राइबर से एक्टीवेशन शुल्क, सब्सक्रिप्शन फीस (जो भी एमएसओ से तय की हो), लगनेवाले टैक्स, एसटीबी के किराए की राशि और/या कोई भी अन्य शुल्क इकट्ठा कर लेगा और सब्सक्राइबर से मिले सारे भुगतान को उसे इकट्ठा करने के 24 घंटे के भीतर एमएसओ के बैंक खाते में डाल देगा।

एलसीओ का दूसरे के पास जाना और सेट-टॉप बॉक्स की अदलाबदली

उसने यह भी सुझाव दिया है कि ट्राई को संबंधित क्लॉज़ को बढ़ाकर जोड़ देना चाहिए कि कोई भी एलसीओ क्लॉज़ 9.5 में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का अनुसरण किए बिना किसी अन्य डिस्ट्रीब्यूटर के पास नहीं जा सकता।

इसी मसले पर डेन का सुझाव है कि प्रारूप समझौते में बॉक्सों की अदलाबदली जैसे एलसीओ के कदाचार के खिलाफ एमएसओ को बचाने के लिए उचित तंत्र प्रदान किया जाना चाहिए।

क्लॉज़ 9.6 में प्रस्ताव रखा गया है कि एलसीओ किसी भी व्यावसायिक सब्सक्राइबर और किसी अन्य संस्था को कनेक्शन नहीं देगा जो सिग्नलों का इस्तेमाल केबल सिग्नलों को आगे री-ट्रांसमिट करने के लिए कर रही हैं।

उसने यह भी दलील दी है कि  ट्राई को सेवा की गुणवत्ता (क्यूओएस) नियमन में संशोधन अनिवार्य कर देना चाहिए कि एलसीओ एमएसओ के साथ शिकायत निगरानी प्रणाली स्थापित करने की जिम्मेदारी साझा करें क्योंकि वे ही सीधे ग्राहकों से डील करते हैं और जानते हैं कि उनके नेटवर्क में क्या तकनीकी समस्याएं हैं।

ट्राई ने सुझाव दिया है कि प्रारूप समझौते के प्रस्ताव के अनुसार आवेदक की विशिष्ट पहचान संख्या (यूआईएन) निकालने की ज़िम्मेदारी एमएसओ की होगी, न कि एलसीओ की।

एआईडीसीएफ का कहना है कि ट्राई को सब-क्लॉज़ 17 (iv) निकाल देना चाहिए जिसमें ग्राहक के शिकायत के समाधान की समग्र जिम्मेदारी एमएसओ पर डाली गई है क्योंकि इसकी व्याख्या बहुत व्यापक हो सकती है और इससे अनावश्यक मुकदमेबाज़ी चल सकती है।

सरकार को टैक्स की अदायगी के बारे में फेडरेशन का सुझाव है कि उसमें “संबंधित कर अधिकरणों के लागू होनेवाले नियम व विनियम” शब्द जोड़ दिए जाएं।

फेडरेशन ने यह भी अनुरोध किया है कि प्रारूप समझौते से वो पैराग्राफ हटा दिया जाए जिसमें एसएसओ या एलसीओ के लिए अनिवार्य बनाया गया है कि वे सब्सक्राइबर के भुगतान न देने की स्थिति में एसएमएस में सारा विवरण अपडेट करें क्योंकि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है और इससे भ्रम पैदा हो सकता है।

अगर भुगतान नहीं होता है तो फेडरेशन का कहना है कि दोषी पक्ष से स्टेट बैंक की आधार दर के ऊपर 4 प्रतिशत साधारण ब्याज लिया जाना चाहिए।

डेन ने ट्राई से यह भी आग्रह किया है कि वो वैकल्पिक व्यवस्था करें और प्रारूप समझौते के अनिवार्य मानक इंटरकनेक्शन समझौते (एसआईए) वाले भाग को उन मामलों को लागू करने का तरीका सुझाए जिसमें संबंधित पक्ष आय में हिस्सेदारी की शर्तों पर सहमति नहीं बना पाते।

क्या सोचते हैं एलसीओ

महाराष्ट्र केबल ऑपरेटर्स फेडरेशन (एमसीओएफ) का सुझाव है कि हालांकि बिल एमएसओ को ही निकालना चाहिए, लेकिन बिल पर हमेशा अंतिम कड़ी के ऑपरेटर (एलएमओ) का नाम होना चाहिए। उसका कहना है कि एमएसओ को ट्रांसफर प्राइसिंग यानी, हर महीने ग्राहक आधार खपत विवरण के हिसाब से आईसीए शर्तों पर आधारित इनवॉयस एलएमओ को देनी चाहिए।

उसका यह भी कहना है कि आय में हिस्सेदारी का मसला एमएसओ और एलएमओ द्वारा समझौते से तय किर सकते हैं और इसमें कस्टमर बिलिंग, प्लेसमेंट फीस और केबल चैनलों की विज्ञापन आय को शामिल किया जा सकता है।

केबल ऑपरेटर फेडरेशन ऑफ इंडिया (कोफी) का सुझाव है कि एमएसओ ग्राहक की तरफ से चूक होने की स्थिति में सिग्नलों को डिस्कनेक्ट नहीं करना चाहिए। इसके बजाय के कनेक्शन को कुछ समय तक रोक रख सकते हैं।

कोफी का कहना है कि बहुत सारे मामलों में एमएसओ के पास ऐसा कोई अंतिम तरीका नहीं होता जिससे वे एलसीओ पर उव ग्राहकों को डिस्कनेक्ट करने का दबाव बना सकें जिनसे एलसीओ को धंधे में नुकसान हो रहा है।

फेडरेशन ने यह भी कहा है कि इंटरकनेक्शन समझौते के एमएसओ और एलसीओ को इस तरह के स्थाई या अर्ध-स्थाई संबंध में बांध देना चाहिए जिससे वे भलीभांति एकीकृत नेटवर्क बना सकें जो मात्र टीवी चैनल ही नहीं, बल्कि सभी ब्रॉडबैंड सेवाएं भी देता हो।