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ट्राई ने डीपीओ द्वारा संलाचित प्लेटफॉर्म सेवाओं को नियामक ढांचे के अधीन किया

मुंबई: भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने मल्टी-सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) और लोकल केबल ऑपरेटरों (एलसीओ) द्वारा चलाई जा रही प्लेटफॉर्म सेवाओं को नियामक ढांचे में लाने के लिए अपनी सिफारिशें जारी कर दी हैं। इन्हें ‘रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क फॉर प्लेटफॉर्म सर्विसेज़’ के नाम से जारी किया गया है।

इसके दायरे में डीटीएच, आईपीटीवी व हेडएंड-इन-द-स्काई (हिट्स) जैसे अन्य डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटरों (डीपीओ) को भी ले आया गया है।

सूचना व प्रसारण मंत्रालय को सौंपी गई अपनी सिफारिशों में प्राधिकरण ने प्लेटफॉर्म सेवा (पीएस) और उस कंटेंट को परिभाषित किया है जिन्हें ऐसे चैनलों पर दिखाया जा सकता है।

डीपीओ को कोई भी स्थानीय सूचना और स्थानीय मसलों की बुलेटिन प्रसारित करने से पहले ज़िले के सरकारी अधिकारियों का पूर्व अनुमति लेनी होगी। पीएस चैनल चलानेवाले डीपीओ के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सीमा और आवश्यक नेटवर्थ में कोई तब्दीली नहीं की गई है।

ट्राई ने दी जा रही प्लेटफॉर्म सेवाओं के पंजीकरण के लिए सूचना व प्रसारण मंत्रालय द्वारा ऑनलाइन प्रणाली बनाने की सिफारिश की है। पंजीकरण दी जा रही सूचनाओं के आधार पर किया जाएगा और प्रति पीएस चैनल पंजीकरण का शुल्क 1000 रुपए रखा गया है।

प्लेटफॉर्म सेवा देने के इच्छुक डीपीओ का गठन भारती कंपनी अधिनियम 2013 के तहत कंपनी के रूप में किया जाना चाहिए। नियामक संस्था ने ऐसे चैनलों की संख्या भी बांध दी है जो डीपीओ अपने सब्सक्राइबरों के लिए पेश कर सकते हैं।

डीपीओ को इस संबंध में सूचना व प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुपालन के लिए 12 महीनों का वक्त दिया गया है।  पीएस पर अपनी सिफारिशों के साथ ही ट्राई ने ग्राउंड-बेस्ट या ज़मीनी स्तर के ब्रॉडकास्टरों के लिए भी खुद-ब-खुद अनुशंसाएं पेश कर दी है।

यह ऐसा सुनिश्चित करने के लिए किया गया ताकि भारत में किसी भी नेटवर्क पर वितरित किया जा रहा हर टीवी चैनल नियामक ढांचे के अंतर्गत आ जाए, चाहे उसे सैटेलाइट-आधारित ब्रॉडकास्टर से लिया जा रहा हो या नेटवर्क ऑपरेटर ने उसे प्रोड्यूस किया हो या उसे किसी टेरिस्ट्रियल ब्रॉडकास्टर से लिया गया हो।

ज़मीनी स्तर के ब्रॉडकास्टरों के सिफारिशें मोटे तौर पर सैटेलाइट ब्रॉडकास्टरों जैसी ही रखी गई हैं। बस, उन्हें सैटेलाइट स्पेक्ट्रम और इस संबंध में दूरसंचार विभाग (डॉट) और अंतरिक्ष विभाग (डीओएस) के अनुमोदन लेने की शर्त से मुक्त रखा गया है।

टीवी चैनल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर एफएम रेडियो चैनलों की रीट्रांसमिशन की अनुशंसा की गई है बशर्ते उसके लिए सभी वैधानिक अधिकार हासिल कर लिए गए हों। लेकिन नियामक संस्था ने कहा है कि इस मुद्दे पर बाद में किसी समय फिर से तब समीक्षा की जाएगी, जब भारत में एफएम रेडियो उद्योग का पूरा विकास हो जाता है।

ट्राई की ताज़ा सिफारिशों का सारांश

1. पीएस की परिभाषा: “प्लेटफॉर्म सेवाएं (पीएस) डीपीओ द्वारा अपने सब्सक्राइबरों के लिए विशेष रूप से ट्रांसमिट किए जा रहे प्रोग्राम हैं और इसमें दूरदर्शन के चैनल और पंजीकृत टीवी चैनल शामिल नहीं हैं। पीएस में वे विदशी टीवी चैनल नहीं आते जो भारत में पंजीकृत नहीं हैं।”

2. जहां तक पीएस पर स्थानीय न्यूज़ और समसामयिक मामलों के बुलेटिन के प्रसारण का संबंध है, ट्राई ने गैर-खबरों के रूप में निम्नलिखित श्रेणियों को रखा है और इसके प्रसारण की अनुमति है:
(i) स्थानीय घटनाओं और अन्य स्थानीय मामलों के बारे में सूचना जो स्थानीय स्तर पर और स्थानीय स्रोत से जुटाई गई हों और जो न्यूज़ एजेंसियों से या न्यूज़ चैनलों/सूत्रों के प्रसारण से प्राप्त न हों;
(ii) खेल की इवेंट्स से संबंधित सूचना लाइव कवरेज को छोड़कर। हालांकि, स्थानीय खेल इवेंट्स की लाइव कमेंट्री की अनुमति दी जाती है इस शर्त पर कि उसके लिए प्रसारण अधिकार किसी और के पास नहीं हो;
(iii) यातायात और मौसम से संबंधित सूचना;
(iv) सूचना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों, उत्सवों की कवरेज;
(v) परीक्षाओं, रिज़ल्ट, एडमिशन, कैरियर परामर्श से संबंधित विषयों की कवरेज;
(vi) रोजगार के अवसरों की उपलब्धता; और,
(vii) स्थानीय प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए गए बिजली, पानी की आपूर्ति, प्राकृतिक आपदाओं, स्वास्थ्य अलर्ट आदि जैसी नागरिक सुविधाओं से संबंधित सार्वजनिक घोषणाएं।

साथ ही ट्राई की सिफारिश है कि डीपीओ को पहले से इस संबंध में अधिकृत अधिकारी से पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी। राज्य सरकार को इस तरह की अनुमति देने के लिए कोई शुल्क नहीं लेना चाहिए। ट्राई ने पीएस सेवाएं देने वाले डीपीओ से केबल टेलिविजन नेटवर्क नियम, 1994 के तहत निर्धारित कार्यक्रम और विज्ञापन संहिता का पूरा पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा है।

3. ट्राई ने कहा है कि सूचना व प्रसारणमंत्रालय को सभी डीपीओ के लिए सरल ऑनलाइन प्रणाली लानी चाहिए जिसके ज़रिए वे अपने पीएस चैनलों को उसके पास पंजीकृत करा सकें और भ्रम व अस्पष्टता की सारी स्थिति खत्म हो सके।

ट्राई ने यह भी बताया है कि क्या बुनियादी जानकारियां डीपीओ को उपलब्ध करानी पड़ सकती हैं। इनमें शामिल है – (i) इकाई का नाम; (ii) कंपनी रजिस्ट्रार (आरओसी) द्वारा दी गई कॉरपोरेट पहचान संख्या (सीआईएन); (iii) लाभार्थी मालिकों की पहचान; (iv) कामकाज़ का पता/जगह/क्षेत्र; (v) डीपीओ की श्रेणी और अगर वो केबल ऑपरेटर है तो डैस वाला या बिना डैस वाला; और (vi) दिखाए जानेवाले कंटेंट का स्वरूप/जॉनर।

उसने कहा है कि प्रणाली खुद-ब-खुद पीएस चैनल के पंजीकरण की पावती निकाल देगी और केवल पंजीकरण के बाद ही कोई डीपीओ पीएस चैनल शुरू कर सकता है।

4. लाइसेंस की अवधि पीएस चैनल के पंजीकरण की वैधता डीपीओ के ऑपरेटिंग लाइसेंस/पंजीकरण के साथ चलनी चाहिए। अगर डीपीओ के पंजीकरण/अनुमति की अवधि बढ़ती है तो उसके साथ ही पंजीकृत पीएस चैनल की वैधता भी बढ़ जाएगी। इस तरह पीएस चैनलों के पंजीकरण के नवीकरण की कोई ज़रूरत ही नहीं होगी। लेकिन ट्राई की सिफारिश है कि पीएस चैनल को बंद करने या उसके स्वरूप में किसी बदलाव से पहले डीपीओ को उस चैनल का पंजीकरण खत्म या संशोधित करवाना पड़ेगा।

5. पीएस चैनलों पर कोई सालाना फीस नहीं लगाई जानी चाहिए। लेकिन एक बार की पंजीकरण फीस के बतौर प्रति पीएस चैनल 1000 रुपए लिए जाने चाहिए। सूचना व प्रसारण मंत्रालय अपनी अनुशंसित ऑनलाइन पंजीकरण प्रणाली में पंजीकरण फीस जमा कराने के लिए ऑनलाइन पेमेंट गेटवे की व्यवस्था कर सकता है।

6. पंजीकरण के हस्तांतरण और प्लेटफॉर्म सेवाओं (पीएस) को साझा करने के लिए किसी अन्य नेटवर्क के साथ इंटरकनेक्ट करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए।

7. डैस के इलाकों में एलसीओ द्वारा किसी पीएस चैनल को डालने के बारे मे ट्राई ने सिफारिश की है कि उस इलाकों में कार्यरत एलसीओ व एमएसओ कोई उपयुक्त व तकनीकी रूप से व्यवहार्य व्यवस्था यह सुनिश्चित करने के लिए कर सकते हैं ताकि पीएस चैनल पर स्थानीय रूप से प्रासंगिक कंटेंट डिजिटली एड्रेसेबल इनक्रिप्टेड फॉर्मैट में उपलब्ध हो।

9. डैस  के इलाकों में डीपीओ ज्यादा से ज्यादा 15 पीएस चैनल पेश कर सकते हैं। वहीं गैर-डैस इलाकों में डीपीओ अधिकतम पांच पीएस चैनल ही ला सकते हैं। ‘प्लेटफॉर्म सेवाओं पर विनियामक ढांचा’ शीर्षक से जारी अपनी सिफारिशों में ट्राई ने स्पष्ट किया है कि यही सब्सक्राइबरों को उपलब्ध कराए जानेवाले पीएस चैनलों की संख्या है।

10. पीएस सेवा दे रहे डीपीओ के लिए एफडीआई सीमा और नेटवर्क की आवश्यता में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

11. गैर-डैस इलाकों में कार्यरत मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) और लोकल केबल ऑपरेटरों (एलसीओ) के अलावा सारे डीपीओ सुरक्षा मंजूरी हासिल कर चुके हैं, ट्राई का कहना है कि सूचना व प्रसारण मंत्रालय को सुरक्षा मंजूरी मिलने के पहले किसी भी समय पता चलता है कि ऑनलाइन प्रणाली में पंजीकृत पीएस द्वारा दी जा रही प्रोग्रामिंग सेवा भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा या जनहित के खिलाफ जाती है तो मंत्रालय डीपीओ को उस पीएस चैनल या प्रोग्रामिंग सेवा का वितरण रोकने और/या पंजीकरण रद्द करने को कह सकता है।

12. जिन पीएस चैनलों का वितरण अखिल भारतीय स्तर पर किया जाएगा, उनकी निगरानी एजेंसी सूचना व प्रसारण मंत्रालय होगा। बाकी मामलों में डीपीओ सभी पीएस चैनल प्रोग्रामों की 90 दिनों की रिकॉर्डिंग रखेंगे। इसके साथ ही उन्हें इन प्रोग्रामों को दिखाए जाने की तारीख से लेकर एक साल तक लिखित लॉग/रजिस्टर रखना होगा। जरूरत पड़ी तो सूचना व प्रसारण मंत्रालय द्वारा नियुक्त राज्य/ज़िला निगरानी समिति और अधिकृत अफसर रिकॉर्डिंग और रजिस्टर की जांच कर सकता है।

13. पीएस संबंधी दिशानिर्देशों के पहले उल्लंघन पर पीएस चैनल के ट्रांसमिशन पर 30 दिन की रोक लगा दी जानी चाहिए। वहीं दूसरे उल्लंघन पर यह रोक 90 दिन की कर देनी चाहिए। लेकिन अगर तीसरी बार उल्लंघन होता है तो पीएस चैनल का पंजीकरण रद्द कर दिया जाए और उसका प्रसारण किसी भी सूरत में न होने दिया जाए। साथ ही उसके बाद संबंधित डीपीओ द्वारा दिखाए जा सकने वाले पीएस चैनलों की संख्या में उपयुक्त कमी कर दी जाए।

14. नए रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क के पूरे अनुपालन के अधिकतम 12 महीनों का समय दिया जाना चाहिए।

एमएम रेडियो का ट्रांसमिशन

15. एफएम रेडियो चैनलों की रीट्रांसमिशन की इजाज़त तभी दी जाएगी जब उसके लिए सभी अधिकार-धारकों से उचित व्यावसायिक समझौता कर लिया जाए। टीवी चैनल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर एफएम रेडियो चैनलों के रीट्रांसमिशन के लिए जमीनी स्तर के ब्रॉडकास्टरों के लिए प्रस्तावित दिशानिर्देश एफएम रेडियो ऑपरेटरों पर लागू होने चाहिए। लेकिन इस मुद्दे पर बाद में किसी समय फिर से तब समीक्षा की जाएगी, जब भारत में एफएम रेडियो उद्योग का पूरा विकास हो जाता है।