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ट्राई ने केबल व डीटीएच द्वारा दिखाए जाने वाले प्लेटफॉर्म सेवा चैनलों की संख्या बांधी

मुंबई: भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटरों (डीपीओ) द्वारा दिखाए जा सकनेवाले प्लेटफॉर्म सेवा (पीएस) चैनलों की संख्या बांध दी है। इसका प्रत्यक्ष मकसद यह सुनिश्चित करना है कि दर्शकों के सामने केवल स्थानीय स्तर पर प्रासंगिक चैनल ही पेश किए जाएं। लेकिन ट्राई का यह कदम मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) और डायरेक्ट-टू-होम (डीटीएच) सेवा प्रदाताओं के लिए चिंता की बात है और उनके लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।

ट्राई की सिफारिश है कि डैस (डिजिटल एड्रेसेबल सिस्टम) के इलाकों में और अन्य प्लेटफॉर्मों पर डीपीओ ज्यादा से ज्यादा 15 पीएस चैनल पेश कर सकते हैं। वहीं गैर-डैस इलाकों में डीपीओ अधिकतम पांच पीएस चैनल ही ला सकते हैं। ‘प्लेटफॉर्म सेवाओं पर विनियामक ढांचा’ शीर्षक से जारी अपनी सिफारिशों में ट्राई ने स्पष्ट किया है कि यही सब्सक्राइबरों को उपलब्ध कराए जानेवाले पीएस चैनलों की संख्या है।

अभी तक डीपीओ द्वारा दिखाए जानेवाले पीएस चैनलों की संख्या की कोई सीमा नहीं बांधी गई थी।

ट्राई ने कहा है, “इस तरह सीमा बांधना राष्ट्रीय एमएसओ की तरफ व्यापक भौगोलिक इलाकों में उनके स्थानीय चैनलों के वितरण पर सूचना व प्रसारण मंत्रालय द्वारा जताई गई चिंता को सुलझा देगा।”

नियामक संस्था का तर्क है कि सब्सक्राइबर को उपलब्ध पीएस चैनलों की संख्या बांध देने से केबल ऑपरेटर यह सुनिश्चित करने को बाध्य हो जाएंगे कि सब्सक्राइबर को पीएस के रूप में केवल स्थानीय स्तर पर प्रासंगिक चैनल ही पेश किए जाएं।

ट्राई ने कहा कि उसने पाया है कि कुछ एमएसओ बहुत ज्यादा, 80 से अधिक पीएस चैनल दे रहे हैं और अपने केबल टीवी नेटवर्क के स्थानीय इलाके में ही नहीं, बल्कि अपने सारे नेटवर्क पर, जिसका दायरा अक्सर एक राज्य से ज्यादा का होता है।

नियामक संस्था ने यह भी कहा कि डीपीओ को इजाजत मिले पीएस चैनलों की संख्या  के मुद्दे को दो उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। पहला, यह संख्या डीपीओ को अलग पहचान देने के लिए पर्याप्त हो। और दूसरा, काफी सरल व सस्ता नियामक ढांचा होने के नाते उनका इस्तेमाल पारंपरिक ब्रॉडकास्ट रास्ता पकड़ने के मौके के रूप में न किया जाए।

उसका कहना है कि अगर पीएस चैनलों की असीमित या बड़ी संख्या की छूट दे दी जाए तो डीपीओ इसका बेजा फायदा उठा सकते हैं। वे पीएस के उदार नियामक ढांचे का इस्तेमाल करके ब्रॉडकास्टिंग संबंधी नियम-कायदों का उल्लंघन कर सकते हैं।

ट्राई ने अपनी सिफारिश की वजह बताते हुए कहा है कि गैर-डैस इलाकों में केबल की बंधी क्षमता के कारण एक सीमित संख्या में ही एनालॉग चैनल पेश किए जा सकते हैं। इसलिए पीएस चैनलों की संख्या पर सीमा बांधना ज़रूरी था ताकि इन इलाकों में ब्रॉडकास्टरों के लिए पर्याप्त गुंजाइश सुनिश्चित की जा सके।

लेकिन डिजिटल परिवेश में क्षमता का बंधन काफी कम रहता है जिससे अधिक संख्या में पीएस चैनलों की इजाज़त दी जा सकती है।

पीएस चैनलों के परिचालन के भौगोलिक इलाके की सीमा पर ट्राई का कहना है कि डीटीएच ऑपरेटर पहले से अखिल भारतीय स्तर पर काम कर रहे हैं, जबकि केबल ऑपरेटर अपने ही कामकाज के इलाके तक सीमित हैं, खासकर गैर-डैस क्षेत्रों में।

हालांकि ट्राई का मानना है कि केबल टीवी नेटवर्क के डिजिटलीकरण की जारी प्रक्रिया के साथ अगर इस तरह की भौगोलिक सीमाएं पीएस चैनलों पर लगाई जाती हैं तो उनको मॉनीटर करना व्यवहार्य नहीं होगा।