लाइव पोस्ट
चीन में शुरू हुआ दुनिया का सबसे ऊंचा पुल, 14.40 करोड़ डॉलर से बना
नोटबंदी को लेकर तृणमूल कांग्रेस का पीएम मोदी पर कटाक्ष- 'उम्मीद है कल बड़ी घोषणा करेंगे'
सीतापुर में यात्रियों से भरी बस नदी में पलटी, बचाव कार्य जारी
झारखंड में कोयला खदान के अंदर फंसे मजदूर, 10 शव निकाले गए
दिल्ली हाई कोर्ट ने शादियों के लिए बैंक खाते से 2.5 लाख रुपए निकालने के खिलाफ याचिका खारिज़ की
संसद के दोनों सदनों में नोटबंदी के खिलाफ विपक्षी दलों का हंगामा जारी
घोषित काले धन पर लगेगा 50% टैक्स, लोकसभा ने आयकर अधिनियम में संशोधन पास किया

ट्राई के प्रस्तावित सीपीई टैरिफ ऑर्डर से डीटीएच ऑपरेटरों पर नकारात्मक असर पड़ेगा

मुंबई: डायरेक्ट-टू-होम (डीटीएच) ऑपरेटरों ने भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने उस प्रस्ताव पर एतराज़ जताया है जिसमें उपभोक्ता परिसर उपकरणों (सीपीई) को वापस खरीदना अनिवार्य बना दिया गया है। डीटीएच एसोसिएशन का कहना है कि प्रस्तावित टैरिफ ऑर्डर डीटीएच ऑपरेटरों के व्यावसायिक हितों पर गंभीर असर डालेगा, जो पहले से ही 13,000 करोड़ से 15,000 करोड़ रुपए के घाटे में डूबे हुए हैं।

एसोसिएशन ने कहा है कि प्रस्तावित टैरिफ ऑर्डर में तय किया गया है कि डीटीएच ऑपरेटरों को उपभोक्ता को बायबैक/रिफंड की मानक सहूलियत देनी होगी, जिससे डीटीएच ऑपरेटर के लिए दोहर कराधान की स्थिति पैदा हो जाएगी।

डीटीएच एसोसिएशन ने नियामक संस्था को भेजी गई अपनी प्रतिक्रिया में कहा है, “प्राधिकरण ने इस बात पर गौर नहीं किया कि सीपीई के बायबैक व फिर से प्रावधान करने की सूरत में कंपनी द्वारा दिए जा चुके टैक्स सभी स्थितियों में वापस पाने के दावे नहीं किए जा सकते। इसी तरह की समस्या क्रेडिट पाने में भी होगी।”

एसोसिएशन ने उल्लेख किया है कि ट्राई ने अपने व्याख्यात्मक ज्ञापन में कहा है कि 45 प्रतिशत डीटीएच उपभोक्ता अब तक इधर से उधर हुए हैं। इस तरह के चर्न के चलते डीटीएच उद्योग को  नुकसान हो रहा है।

उसका कहना है,  “इस तरह के आंकड़े होने के बावजूद ट्राई ने चर्न के प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया।”

कराधान के अलावा एसोसिएशन ने इस बात पर भी अफसोस जताया है कि प्राधिकरण ने गौर ही नहीं किया कि नया सब्सक्राइबर पुराने सीपीई उपकरण को खरीदने के लिए तैयार नहीं होगा।

उसने यह भी कहा कि पांच साल तक सीपीई के मुफ्त रिपेयर और रिप्लेसमेंट की अनिवार्यता असंगत है और डीटीएच ऑपरेटरों के हितों को चोट पहुंचाती है क्योंकि इससे उनकी लागत बढ़ जाएगी। कारण, मेंटेनेंस का काम आमतौर पर बाहर की फर्मों को दिया जाता है जो हर विजिट का पैसा लेते हैं।

साथ ही एसोसिएशन का कहना है कि सीपीई में ऐसी तमाम वजहों से फॉल्ट आ सकता है और उसे रिपेयर करने की ज़रूरत पड़ सकती है जिसमें सीपीई लगानेवाले की कोई भूमिका न हो।

एसोसिएशन ने यह भी तर्क दिया है कि नियामक संस्था ने सीपीई के बायबैक/रिफंड मूल्य का निर्धारण करते वक्त रिफर्बिशिंग, डीलर व डिस्ट्रीब्यूशन कमीशन के खाते के नुकसान, वास्तविक डि-इंस्टालेशन, लाने-ले जाने का खर्च, इन्वेंटरी होल्डिंग, कलेक्शन केंद्र, टेस्टिंग व सत्यापन और टेक्नोलॉज़ी अपग्रेड व बदलाव जैसे तमाम मसलों पर गौर ही नहीं किया है।

एसोसिएशन का कहना है कि सीपीई पर पिछला टैरिफ ऑर्डर केवल एसडी सेट-टॉप बॉक्सों (एसटीबी) तक सीमित था। इसलिए अब एचडी एसटीबी को मानक स्कीम में शामिल करना अनुचित है क्योंकि एचडी सेवाएं तितिक्षा के दौर में हैं। फिर, दोनों सेवाओं की लागत संरचना अलग है और इनमें तुलना नहीं की जा सकती। उसने प्राधिकरण से आग्रह किया कि वह एसडी सीपीई को छोड़कर बाकी सभी तरह के सीपीई को टैरिफ ऑर्डर से बाहर कर दे।

एसोसिएशन ने कहा कि ट्राई ने 150 रुपए का कलेक्शन शुल्क तय करने का कोई तार्किक आधार नहीं पेश किया है क्योंकि इंस्टॉलेशन और अन-इंस्टॉलेशन, दोनों ही काम कुशल तकनीशियन द्वारा ही किया जा सकता है। उसने सुझाव दिया है कि कलेक्शन शुल्क इंस्टॉलेशन शुल्क जितना ही होना चाहिए जो अभी 350 रुपए रखा गया है।

ग्राहकों के लिए जुड़े रहने की तीन महीने की लॉक-इन अवधि की शर्त पर एसोसिएशन का कहना है कि न्यूनतम लॉक-इन अवधि 12 महीने से कम नहीं होनी चाहिए। तीन महीने की लॉक-इन अवधि की शर्त से डीटीएच ऑपरेटरों को नुकसान होगा। उसने आगे कहा है कि कोई डीटीएच ऑपरेटर तभी पैसे कमा सकता है जब ग्राहक उसके साथ तीन से चार साल तक जुड़ा रहे।

एक्टीवेशन व इंस्टालेशन की शुल्क पर 350 रुपए की ऊपरी सीमा बांध दिए जाने पर एसोसिएशन का कहना है कि इस शुल्क पर कोई सीमा नहीं बांधी जानी चाहिए क्योंकि एक्टीवेशन शुल्क में तरह-तरह की लागत व प्रभार होते है जिनमें एक्टीवेशन वाउचर, कॉल सेंटर व डेटा सेंटर का खर्च शामिल है। साथ ही ये शुल्क सेवाओ को एसडी से एचडी में अपग्रेड करने पर बढ़ जाते हैं।

एसोसिएशन ने कहा है, “डीटीएच ऑपरेटरों को अपने बिजनेस मॉडल और सब्सक्राइबर को दी जा रही स्कीम के हिसाब से एक्टीवेशन फीस तय करने की छूट मिलनी ही चाहिए।”

उसका कहना कि मसौदा टैरिफ ऑर्डर न केवल व्यावसायिक रूप से अव्यवहार्य है, बल्कि यह कानूनी तौर भी अमान्य है क्योंकि सीपीई के टैरिफ को रेग्युलेट करना ट्राई के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता क्योंकि यह ब्रॉडकास्टिंग व केबल सेवाओं के दायरे से बाहर है। उसने यह भी कहा कि इस मसले को अभी सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुलझाया जाना बाकी है।

ट्राई को सीपीई पर मसौदा टैरिफ ऑर्डर तब लाना पड़ा जब दूरसंचार विवाद निपटान व अपीलीय ट्राइब्यूनल (टीडीसैट) ने उसके पहले के टैरिफ ऑर्डर को रद्द कर दिया था। ट्राइब्यूनल ने साफ किया था डीटीएच ऑपरेटरों द्वारा उपलब्ध कराए गए इनपुट और उनके द्वारा उठाए गए मसलों का समाधान करते हुए ट्राई नया टैरिफ ऑर्डर ला सकता है।