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ट्राई के क्यूओएस संशोधन पर राय एमएसओ की: उपभोक्ता बिलिंग का ज़िम्मा एलसीओ का

मुंबई: उपभोक्ता बिलिंग लोकल केबल ऑपरेटरों (एलसीओ) की भी ज़िम्मेदारी है, यह तर्क देते हुए मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) ने भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) से आग्रह किया है कि वह सब्सक्राइबर को बिल उपलब्ध नहीं कराने पर एमएसओ पर जुर्माना लगाने के सेवा की गुणवत्ता (क्यूओएस) संबंधी विनियमन के अपने प्रस्तावित संशोधन पर पुनर्विचार करे।

ट्राई के संशोधन वाले मसौदे पर अपनी राय पेश करते हुए हैथवे केबल एंड डाटाकॉम ने कहा है कि सब्सक्राइबरों के लिए बिल और रसीद उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से एमएसओ या एलसीओ पर डाली जानी चाहिए। एलसीओ चालान बनाकर सब्सक्राइबरों से पैसे लेता है।

एमएसओ वर्तमान में एलसीओ को बिलिंग करते हैं और एलसीओ सब्सक्राइबरों को बिलिंग करते हैं। यह बताते हुए, हैथवे ने कहा कि उपभोक्ताओं को बिल भेजने और रसीद जारी करने की एकमात्र ज़िम्मेदारी एलसीओ की होनी चाहिए।

हैथवे ने कहा कि वित्तीय हतोत्साहन की कार्यवाही बहुत अधिक भारी पड़ती है और दंड की राशि बहुत ज़्यादा है। एलसीओ और एमएसओ के बीच समझौता होने के मामले में सिर्फ एमएसओ को ही दंडित करना एमएसओ के प्रति दमनकारी रवैया है।

इसके अलावा एमएसओ और एलसीओ के बीच जब कोई समझौता नहीं है तो उस मामले में भी सिर्फ एमएसओ को दंडित करना अनुचित है। इस प्रकार वित्तीय दंडात्मक कदम समस्या का हल करने में सक्षम नहीं हो सकता और एमएसओ व एलसीओ के बीच कटुता पैदा कर सकता है।

सिटी केबल ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन अधिकार वर्तमान क्यूओएस विनियमन के विपरीत है। फिलहाल एमएसओ व एलसीओ दोनों को प्राधिकरण ने आपस में सहमत शर्तों के आधार पर सेवा स्तर के समझौते करने और क्यूओएस ज़िम्मेदारियों को साझा करने की अनुमति दी है क्योंकि केबल टीवी एक्ट के तहत एलसीओ भी एक पंजीकृत संस्था है।

एमएसओ को क्यूओएस विनियमन के अनुपालन की समग्र ज़िम्मेदारी सौंपी गई है क्योंकि सब्सक्राइबर प्रबंधन प्रणाली (एसएमएस) उनके यहां स्थापित की जाती है। लेकिन एमएसओ ने तर्क दिया कि जब विशिष्ट ज़िम्मेदारियां संविदात्मक व्यवस्था/सेवा स्तर के समझौते के तहत एलसीओ को सौंप दी जाती है तो उनके अनुपालन के लिए एलसीओ को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

एमएसओ ने आश्चर्य व्यक्त किया कि आईपीटीवी या हिट्स के लिए कोई क्यूओएस शर्तें नहीं हैं और डीटीएच के मामले में भी बिलिंग के संबंध में क्यूओएस नियम बहुत ढीले हैं और डिजिटल केबल टीवी के लिए निर्धारित नियमों की तरह कड़े नहीं हैं।

एमएसओ ने आग्रह किया कि जैसे प्रीपेड बिलिंग मॉडल में प्राधिकरण ने सेवा प्रदाताओं को निर्देश दिया है कि नाममात्र कीमत पर सब्सक्राइबरों से अनुरोध पर बिलिंग विवरण प्रदान करे वैसी ही अनुमति पोस्ट पेड बिलिंग के मामले में भी दी जानी चाहिए।

सिटी केबल ने यह भी कहा कि मांगे बिना चालान/रसीदें उपलब्ध कराने से एमएसओ/एलसीओ की परिचालन लागत में वृद्धि ही नहीं होगी बल्कि उन्हें असामाजिक तत्वों द्वारा झूठी शिकायतों के तहत फंसाया जा सकता है। इसके अलावा यह भी स्पष्ट नहीं है कि सब्सक्राइबर के लिए चालान/रसीद की डिलीवरी का स्वरूप क्या होगा।

डिजिकेबल ने यूं तो इलेक्ट्रॉनिक प्री-पेड पद्धति पर ट्राई के संशोधन का स्वागत किया है। लेकिन उसका कहना है कि केबल टीवी बिज़नेस में सब्सक्रिप्शन आय का निपटारा मासिक आधार पर किया जाता है और इसलिए प्री-पेड प्लान के तहत किसी भी तरह के स्वत: समायोजन से हितधारकों के बीच कानूनी विवाद पैदा हो सकते हैं।

डिजिकेबल ने निम्नलिखित स्थितियों में ट्राई से स्पष्टीकरण की मांग की है:

1) जब एक सब्सक्राइबर 3/6/12 माह की प्री-पेड स्कीम चुनता है लेकिन वह समय से पहले यह स्कीम छोड़कर पोस्ट-पेड स्कीम लेना चाहता है। इसमें समस्या इसलिए पैदा होती है कि बाद में उपभोग की जाने वाली सेवाओं के लिए प्राप्त भुगतान एलसीओ/अंतिम ऑपरेटर (एलएमओ) को तुरंत चुका दिया जाता है और ऐसे सौदों को पलटना एक बड़ी चुनौती है।

उदाहरण के तौर पर, एक पे चैनल 10 रुपए के मासिक अ ला कार्टे दर पर उपलब्ध है और छह माह के प्री-पेड विकल्प में 45 रुपए की कीमत पर उपलब्ध है। इस स्कीम से समय से पहले सब्सक्राइबर द्वारा निकल जाने पर एसएमओ और ब्रॉडकास्टर के खातों के मिलान में मुश्किल होगी।

2) क्रेडिट बैलेंस वाला कोई सब्सक्राइबर अपने केबल टीवी सेवा को समय पूरा होने से पहले डिस्कनेक्ट करना चाहता है;

3) एलएमओ जब अपने प्री-पेड सब्सक्राइबरों के क्रेडिट बैलेंस के साथ दूसरे एमएसओ के साथ जुड़ता है;

4) ब्रॉडकास्टर अगर प्री-पेड विकल्प में सदस्यता चैनल बंद कर दे या किसी अन्य बुके में चैनल डाल दें जिसकी सदस्यता एमएसओ के पास नहीं है;

5) सब्सक्राइबर उस चैनल की मांग करता है जिसके लिए एमएसओ और ब्रॉडकास्टर के बीच बातचीत चल रही है;

6) प्री-पेड स्कीम के तहत पेश किए गए चैनल की सदस्यता का समझौता समाप्त हो जाता है। पर प्री-पेड स्कीम चालू है;

7) ब्रॉडकास्टर विशेष रूप से लंबी अवधि की 180/360 दिनों की स्कीम में चैनल की कीमत बढ़ा देता है और इसे एक प्री-पेड विकल्प के तहत सब्सक्राइब किया गया है।

क्यूओएस विनियमन के उल्लंघन पर एमएसओ और एलसीओ दोनों पर वित्तीय दंडात्मक कार्यवाही करने के संबंध में डिजिकेबल ने प्रस्ताव दिया कि मामले के मुताबिक दंड की निर्धारित दर एमएसओ पर या जुड़े केबल ऑपरेटर/एलएमओ या दोनों पर लगाई जानी चाहिए।

अन्य एमएसओ द्वारा उठाए गए मसलों पर प्रकाश डालते हुए आईएमसीएल ने कहा कि विनियामक को एमएसओ पर भारी दायित्व नहीं डालने चाहिए क्योंकि वह तो मात्र एग्रीगेटर व समन्वयक है और एलसीओ-सब्सक्राइबर संबंधों में कम से कम या न के बराबर उसकी सुनी जाती है।

आईएमसीएल ने अपने पक्ष में मजबूत मामला बनाते हुए ट्राई के सामने निम्नलिखित मुद्दे रखे हैं:

अ)  एलएमओ मनोरंजन टैक्स से जुड़े मसलों का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि चूंकि वे आखिरी पहुंच/सब्सक्राइबर के मालिक हैं, इसलिए वे टैक्स का भुगतान सीधे अधिकारियों को करेंगे;

आ)  प्रतिस्पर्धियों द्वारा सेट-टॉप बॉक्सों की अदला-बदली जिससे सब्सक्राइबर का स्वामित्व अलग-अलग हाथों में चला जाता है;

इ)  तर्कहीन मांगों के चलते ब्रॉडकास्टरों के साथ कटेंट करार नहीं हो सके हैं। इसलिए एमएसओ अभी एलएमओ/सब्सक्राइबर को पैकेज देने की स्थिति में नहीं हैं। बिलिंग पर चक्रीय असर पड़ता है क्योंकि कंटेंट के अभाव में बिलिंग का आधार बन ही नहीं सका है।

उसने यह भी दलील दी है कि नियामक संस्था का इलेक्ट्रॉनिक प्री-पेड सिस्टम लाने का उद्देश्य और इस तरह मोबाइल व डीटीएच ऑपरेटरों के साथ सादृश्य निकालना केबल टीवी सेवाओं के संदर्भ में संभव नहीं है। सब्सक्राइबर का स्वामित्व मोबाइल व डीटीएच ऑपरेटरों के पास रहता है, जबकि एमएसओ के मामले में ऐसा नहीं है। यहां को सब्सक्राइबर का स्वामित्व एलएमओ के पास रहता है। इसलिए ज़मीनी हकीकत की रौशनी में इस मुद्दे पर फिर से गौर करने की जरूरत है।

सेवा की गुणवत्ता (क्यूओएस) संबंधी नियमन का पालन न करने के जुर्माने की मात्रा के बारे में आईएमसीएल ने नियामक संस्था ने अनुरोध किया है कि वो ऐसे संशोधन के कठोरर प्रभाव पर विचार करे क्योंकि एमएसओ ने डिजिटलीकरण के अभियान को लागू करने पर भारी निवेश के रूप से बहुत सारा धन खर्च कर रखा है।

तमाम एमएसओ ने एकस्वर से साफ-साफ कहा है कि प्रस्तावित संशोधनों को लागू करने के लिए दिया गया 30 दिन का समय अमल की बाधाओं को देखते हुए बहुत ही कम है।

हैथवे का सुझाव है कि गजट में संशोधनों के प्रकाशित होने के छह महीने बाद उन पर अमल होना चाहिए। ट्राई ने इस संशोधन में प्रस्ताव रखा है कि इलेक्ट्रॉनिक प्री-पेड पद्धति के तहत सब्सक्राइबर द्वारा दी गई रकम ली गई सेवाओं के एवज में अपने-आप समायोजित हो जाए। हैथवे ने कहा है कि इस पद्धति पर अमल के लिए एमएसओ को न केवल नया निवेश करना पड़ेगा, बल्कि इसको विकसित करने, परीक्षण करने और फिर लागू करने में वक्त लगेगा।

डिजिकेबल का कहना है कि एमएसओ द्वारा इलेक्ट्रॉनिक प्री-पेड पद्धित लाने के लिए एमएमओ द्वारा पूंजीगत खर्च और परिचालन खर्च, दोनों ही तरीके से जो अतिरिक्त निवेश किया जाएगा, उसकी भरपाई के लिए नीचे लिखे उपाय किए जा सकते हैं:

1)    क्यूओएस नियमन की तारीख से छह महीने का समय मुहैया कराया जाए क्योंकि इलेक्टॉनिक प्री-पेड पद्धति लगाने पर कोफी निवेश होता है, डिजाइनिंग की प्रक्रिया लंबी है और मजबूत बैकएंड सिस्टम लगाने पड़ेंगे।

2)    प्री-पेड रिचार्ज विकल्पों की इजाज़त देते हुए वाजिब ट्रांजैक्शन शुल्क लगाया जाए।

3)    शुरू में कुछ निश्चित रिचार्ज विकल्प दिए जाएं और अंततः विविध हितधारकों के मसलों को सुलझाने के लिए ज्यादा रिचार्ज विकल्प जोड़ दिए जाएं।

4)    डिजिटल केबल टीवी सब्सक्राइबरों के लिए प्री-पेड विकल्प कम से कम महीने या उसके गुणकों जैसे, 30 दिन, 60 दिन, 90 दिन, 120 दिन, 180 दिन व 360 दिन के होने चाहिए क्योंकि एलएमओ व ब्रॉडकास्टरों जैसे अन्य पक्षों के भुगतान का निपटारा महीने-महीने पर किया जाता है। इससे बिजनेस की लेनदेन में पारदर्शिता आएगी और विवाद व कानून मुद्दे कम से कम होंगे।

उसने यह भी अनुरोध किया है कि संशोधन पर अमल की तारीख के एक साल बाद ही ट्राई को वित्तीय हतोत्साहन लागू करना करना चाहिए क्योंकि सिस्टम पर अमल में शुरुआती दिक्कतें आएंगी जिन्हें सुलझाने में थोड़ा वक्त लग सकता है।

आईएमसीएल की सिफारिश है कि मनोरंजन टैक्स जैसे चीजों पर अमल से पहले जो बहुतेरे प्रशासनिक काम किए जाने हैं और ब्रॉडकास्टरों के मुद्दों पर टीडीसैट में लंबित तमाम याचिकाओं के मद्देनज़र शुरुआत करने का समय 30 दिन से बढ़ाकर 120 दिन कर दिया जाना चाहिए।

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